नन्द के आनंद भयो...

प्रतीक्षा कीजिये, वो आएंगे ही.... मध्य भारत का गौरवशाली साम्राज्य हस्तिनापुर, एक समय का वैभव और शक्ति का प्रतीक, अब धीरे-धीरे षड्यंत्रों की भंवर में फंसता जा रहा था। सिंहासन पर विराजमान राजा अपनी बुद्धि को दूर गांधार की कुटिल चालों के हवाले कर अपने आपको निश्चिंत मान चुका था। तो युग का वह महानतम योद्धा, जिसका नाम ही शत्रुओं के दिलों में खौफ पैदा करता था, अब असहाय-सा बंधन में जकड़ा हुआ था। उसके लिए स्वयं का स्व बड़ा था यही उसके लिए धर्म था और यही राष्ट्र धर्म। एक अनैतिक प्रेम से जन्मा तूफान हस्तिनापुर को अधर्म के पंजों में जकड़ने को तैयार खड़ा था। उधर, मथुरा में सत्तान्ध कंस अधर्म का परचम लहरा रहा था। उसने अपने पिता, बहन, बहनोई और पूरे कुटुंब को कैद की बेड़ियों में जकड़ लिया था । उसके जैसे ही शैतानी मानसिकता वाले ताकतें उसका साथ दे रही थीं, और धर्म को मानने वाले लोग लाचार थे, विवश थे और थे मौन । पूर्व में मगध की धरती पर जरासंध का राज था—एक ऐसा शासक, जिसका खुद का अस्तित्व भी दो गर्भों से जन्मे टुकड़ों को राक्षसी मंत्रों से जोड़कर बना था। उसकी ताकत, उसका बल, उसका रौब—कोई उसके आसपास भ...