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चंद्र शेखर जी - संभावनाओं से भरे संगठन शिल्पी

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भाजपा में संगठन महामंत्री एक विशिष्ट दायित्व है, जिसका निर्वहन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आए प्रचारक करते रहे है, राजस्थान में भी दो साल पहले तक ऐसे ही प्रचारक जो उत्तर प्रदेश से आए थे लगभग सात साल रहे, अब वे तेलंगाना में ऐसी ही जिम्मेदारी निभा रहे है। मैं बात कर रहा हूँ श्री चंद्र शेखर जी की, जिनका आज जन्मदिन भी है। उन्होंने राजस्थान में ऐसे समय में काम संभाला जब बरसो से प्रदेश में कोई संगठन मंत्री नहीं थे, संगठन सत्ता केंद्रित हो गया था। राजनीति की यह विडंबना ही है कि संगठन सत्ता केंद्रीत होता जाता है अगर उसे संगठन तंत्र का कोई सिद्ध हस्त नहीं संभाले, इसीलिए भाजपा के नीति निर्माताओं ने इसे समझा और संगठन कोई विचार केंद्रित रखने के संगठन मंत्री जैसे दायित्व की रचना की।  चंद्रशेखर जी ने उत्तर प्रदेश से यहां आकर थोड़े ही समय में कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कर अपनी अलग पहचान बना जहां कार्यकर्ता अपने मन की बात कह सकता। लोक संग्रही और विचार के आग्रही के रूप में कार्यकर्ताओं ने संगठन में अपने अभिभावक के रूप में स्वीकार किया।  उन्होंने संगठन शास्त्र के एक मंत्र पर कार्यकर्ता के लिए का...

अन्न का अनादर भुखमरी को निमंत्रण?

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  भोजन की बर्बादी: शास्त्रों और धरती माता का अपमान  देश के बड़े बड़े शहर, कस्बे के उन हजारों मध्यवर्गीय अपार्टमेंट्स में, जहां परिवार कर्ज के बोझ तले कराह रहे हैं, हर सुबह एक दर्दनाक दृश्य दोहराता है। मुख्य द्वार के बाहर, सीवर के मेन होल के ढक्कन पर पड़ी पूरियां, रोटी के टुकड़े, चावल और बची हुई सब्जी का ढेर। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि रोज का नियम बन चुका दृश्य है। एक ओर जहां ये परिवार कार की किश्त, मकान का किराया या उसकी इएमआई,बच्चों की स्कूल फीस और महंगाई से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी थालियों से निकला अन्न नाली में समा रहा है। यह दृश्य न सिर्फ दिल दहला देता है, बल्कि सवाल उठाता है — क्या हमारी संवेदनाएं फ्रिज की तरह ठंडी हो गई हैं? यह भोजन की बर्बादी केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि धरती माता की कोख से उपजे अन्न,किसान के पसीने, प्रकृति के संसाधनों और अपने शास्त्रों का सीधा अपमान है। भारतीय शास्त्र अन्न को देवता मानते हैं।  शास्त्रों की सीख समझें  तैत्तिरीय उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है — “अन्नं वै प्राणः”, अर्थात् अन्न ही प्राण है । भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कह...

शिव सदा सहाय, सबको लुभाए

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शिव भारत के महा देव हैं। इस अर्थ में महादेव हैं कि बसते हैं कैलाश में, पर रमते हैं समूचे भारतवर्ष में। जंगलों में, नदियों के किनारे, समुद्र के बीच में और पहाड़ों की चोटियों पर अपना डेरा जमा लेते हैं। तभी तो वे जन मन के देव है, पुत्र पिता रूप में देखते है और नव युवतियाँ के लिए पति रूप में शिव सा ही वर मिले इसकी कामना है, युवक की आराधना में स्वयं को सामर्थ्यशाली बनाने के लिए शिव गौरी जैसी जीवन संगिनी की प्रार्थना। आशुतोष शिव , भारतीय मन को सहज ही लुभाते हैं। ऐसे देवता से जुड़कर हर एक मन महीप बना रहता है। कभी अनुभव नहीं करता कि वह कहीं से हीन है। हाथ में भिक्षा-पात्र, पर औघड़दानी ऐसे कि कोई खाली हाथ लौटा नहीं, मनमाना लेकर गया। महाशिवरात्रि का पर्व आदि देव महादेव को याद करते हुए स्वयं सदाशिव हो जाने का दिन है। अनोखे-अद्भुत औघड़दानी जरूरी नहीं कि वे मंदिर है वहीं मिलेंगे कभी वे पेड़ के नीचे आराम करते मिल जाएंगे। कभी नदी के बीच पत्थरों के साथ केलि करते मिल जाएंगे। कभी घर-आंगन में छोटी-सी कांसे की थाली में कुछ क्षणों के लिए विराज जाएंगे और कभी केवल बमभोला के बोल में। कभी गीत में, कभी नृत्य मे...

वीबी जी रामजी - ग्रामीण भारत के सपनों को नई उड़ान

  भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करोड़ों परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरा है विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025। राष्ट्रपति ने दिसंबर 2025 में इस कानून को मंजूरी दी, और अब यह देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा का नया, मजबूत और आधुनिक रूप बन चुका है। इस नए कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब हर पात्र ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन का वैधानिक रोजगार गारंटी मिलेगी—पहले यह 100 दिन था। यानी 25 दिन का अतिरिक्त रोजगार, जो लाखों-लाख परिवारों के लिए अतिरिक्त कमाई, बेहतर खाना, बच्चों की पढ़ाई और छोटे-मोटे सपनों को पूरा करने का जरिया बनेगा। लेकिन यह सिर्फ दिनों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है। कानून का असली मकसद है ग्रामीण भारत को मजबूत, आत्मनिर्भर और उत्पादक बनाना—जहाँ रोजगार सिर्फ मजदूरी न हो, बल्कि स्थायी आजीविका का आधार बने। कानून लागू होते ही कुछ लोगों ने इसे लेकर गलतफहमियाँ फैलाईं। कुछ ने कहा कि रोजगार गारंटी कमजोर हो गई है, कुछ ने केंद्रीकरण का रोना रोया, तो कुछ ने इसे बजट कटौती का बहाना बताया। लेकिन हकीकत इन दावों से ...

नवरात्र विचार -3 कैसे हो सलाहकार?

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 नवरात्र विचार में आज बात करते हैं कि हमारे सलाहकार कैसे हो और हम सलाहकार कैसे हो ?  जब सुंदरकांड का हम पाठ करते हैं तब उसमें विभीषणजी रावण को समझाते हैं उस समय रावण की सभा में जो प्रतिक्रिया होती है उसको लेकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है- सचिव बैद गुर तीनि जौं  प्रिय बोलहिं भय आस राज धर्म तन तीनि कर  होइ बेगिहीं नास॥ मंत्री, वैद्य और गुरु- ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं (ठकुर सुहाती कहने लगते हैं), तो (क्रमशः) राज्य, शरीर और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ चाटुकारों, डरपोक और स्वार्थी लोगों से घिरा रावण अपनी बुद्धिमत्ता, वीरता और ऐश्वर्य के होते हुए भी नाश को प्राप्त होता है, कीर्ति, यश,तेज, ज्ञान सब कुछ नष्ट हो गया क्योंकि अहंकार हो गया उसे अपने पास सब कुछ होने का और इस अहंकार का पोषण  उसके सचिव सलाहकार ही कर रहे थे। वहीं रामजी की सेना में सलाहकार की भूमिका में जामवंत जी थे, उनकी सलाह कैसी होती थी उसे देखने के लिए हमें किष्किन्धा-काण्ड के उस भाग में जाना है जहां वानर दल माता जानकी की खोज करते हु...

नवरात्र विचार 2 लक्ष्य का सन्धान करें

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नवरात्र चल रहे है तो शक्ति की उपासना घर घर हो रही है, बात शक्ति की हो तो बाबा हनुमंत लाल जी का स्मरण तो सबको आता ही है, वे ना केवल शक्ति के बल्कि युक्ति के भी देवता है।  हर बार जीत की दूदूम्भी नहीं बजाई जाती, लक्ष्य पर नजर रखकर काम करने की प्रेरणा देते है हनुमंत लाल जी। शक्ति की उपासना के पर्व में हनुमंत लाल जी की आराधना में सुन्दरकाण्ड के पाठ भी हो ही रहे है तो आइये, जीवन का एक मंत्र वहीं से सीखते है।      बाबा हनुमंत लाल जी ने लंका की अशोक वाटिका में पहुंचकर माता जानकी के दर्शन करने के उपरांत अशोक वाटिका का विध्वंस किया साथ ही निशाचरों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा, रावण के पुत्र अक्षय कुमार का भी वध किया फिर ब्रह्मास्त्र का मान रखने के लिए मेघनाथ के हाथों बंध कर लंका के राज दरबार में रावण के सम्मुख पहुंचे और फिर लंका जलाकर भगवान राम के पास वापस आए यह हम सब जानते हैं।    पर जाते समय माता सीता का पता लगाने से पहले वे सूक्ष्म रूप धारण करते है, वे जब बाद में सब कुछ तोड़ते, जलाते है तो पहले छुपे क्यों? क्या उन्हें किसी बात का डर था?    नहीं, उनके लिए महत्व...

नवरात्र विचार 1

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 जब सब उसके हाथ है तो मैं क्यों करूँ?  ऐसे ही कई सवाल आपके सामने कई लोगों ने रखें होंगे,  वे अपने इस सवाल के साथ श्रीराम चरित मानस की यह चौपाई सामने रख कर सवाल दागते है। होइहि सोइ जो राम रचि राखा।  को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ क्या इसमें कर्म की मनाही की गई है?  क्या इसमें व्यक्ति को कर्महीन होने को कहा गया है? क्या इसमें सब कुछ ईश्वर ही करेंगे ऐसा कहा गया है? ऐसा नहीं है, तो क्या है इस चौपाई में?  आइये, इसे एक उदाहरण से समझते है। एक किसान खेत में फसल लगाता है तो उसे फसल लगाने से पहले खेत को तैयार करना है, अच्छे बीज लेने है उन्हें अच्छी तरह लगाना भी है। पर इसके आगे बारिश होने या सूखा पड़ने , हवा चलने या हवाएं बंद हो जाने, धूप तेज या जरुरत के अनुसार आने, ओले पड़ने अथवा नहीं गिरने  जैसे काम उसके हाथ नहीं है वह तय नहीं कर सकता, यह सब कुछ विधि के हाथ है, विधाता या नियंता की मर्ज़ी पर है। इसलिए ही इस चौपाई में कहा गया है जो व्यक्ति के प्रयासों से परे है वह ईश्वर के हाथ है, इस पर बहस नहीं हो सकती ना ही व्यक्ति दोषी होता है। इसलिए तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता जी में ...