वीबी जी रामजी - ग्रामीण भारत के सपनों को नई उड़ान
भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करोड़ों परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरा है विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025। राष्ट्रपति ने दिसंबर 2025 में इस कानून को मंजूरी दी, और अब यह देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा का नया, मजबूत और आधुनिक रूप बन चुका है।
इस नए कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब हर पात्र ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन का वैधानिक रोजगार गारंटी मिलेगी—पहले यह 100 दिन था। यानी 25 दिन का अतिरिक्त रोजगार, जो लाखों-लाख परिवारों के लिए अतिरिक्त कमाई, बेहतर खाना, बच्चों की पढ़ाई और छोटे-मोटे सपनों को पूरा करने का जरिया बनेगा। लेकिन यह सिर्फ दिनों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है। कानून का असली मकसद है ग्रामीण भारत को मजबूत, आत्मनिर्भर और उत्पादक बनाना—जहाँ रोजगार सिर्फ मजदूरी न हो, बल्कि स्थायी आजीविका का आधार बने।
कानून लागू होते ही कुछ लोगों ने इसे लेकर गलतफहमियाँ फैलाईं। कुछ ने कहा कि रोजगार गारंटी कमजोर हो गई है, कुछ ने केंद्रीकरण का रोना रोया, तो कुछ ने इसे बजट कटौती का बहाना बताया। लेकिन हकीकत इन दावों से बिलकुल उलट है।
सबसे पहले समझते हैं—क्या वाकई रोजगार गारंटी कम हुई है? बिल्कुल नहीं। 100 दिन से 125 दिन तक बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, यह गारंटी अब और मजबूत हुई है क्योंकि योजना में कई सुधार किए गए हैं। पुराने सिस्टम में अक्सर शिकायत रहती थी कि काम मिलना अनियमित था, पैसे आने में महीनों लग जाते थे, फर्जी जॉब कार्ड बनते थे और काम के बदले बने तालाब, सड़कें या चेक डैम कई बार अधूरे रह जाते थे। नए कानून ने इन कमजोरियों को सीधे संबोधित किया है।
अब ग्राम पंचायतें पहले की तरह ही योजनाएँ बनाती और लागू करती रहेंगी। ग्राम सभा का फैसला अंतिम रहेगा। यानी विकेंद्रीकरण कम नहीं हुआ, बल्कि और व्यवस्थित हुआ है। गाँव की जरूरतों को ब्लॉक, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ा जाएगा ताकि फंड, तकनीक और निगरानी बेहतर हो। यह केंद्रीकरण नहीं, बल्कि अच्छा समन्वय और पारदर्शिता है। निर्णय का अधिकार गाँव में ही रहेगा, सिर्फ अमल में मजबूती आएगी।
कई लोग कह रहे थे कि यह बदलाव बिना बातचीत के थोप दिया गया। लेकिन सच यह है कि इस कानून को बनाने में राज्यों के साथ लंबी-चौड़ी चर्चाएँ हुईं। तकनीकी कार्यशालाएँ, हितधारकों की बैठकें, राज्यों के सुझाव—सब कुछ शामिल किया गया। डिजिटल सिस्टम, एकीकृत योजना, गांव-स्तरीय प्राथमिकताएँ—ये सब राज्यों के अनुभव और फीडबैक से ही निकले हैं।
पैसे के मामले में भी आंकड़े खुद बोलते हैं। 2013-14 में मनरेगा का बजट था महज 33,000 करोड़ रुपये। 2024-25 में यह बढ़कर 2.86 लाख करोड़ हो गया। केंद्र से जारी राशि 2.13 लाख करोड़ से बढ़कर 8.53 लाख करोड़ पहुंच गई। काम के बदले बने मानव-दिन 1,660 करोड़ से बढ़कर 3,210 करोड़ हो गए। पूरे हुए काम 153 लाख से बढ़कर 862 लाख तक पहुंचे। महिलाओं की भागीदारी 48% से बढ़कर 56.73% हो गई। आज 99% फंड ट्रांसफर समय पर हो रहे हैं और 99% मजदूरों का भुगतान सीधे आधार से जुड़ा है। ये आंकड़े उपेक्षा नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती प्रतिबद्धता दिखाते हैं।
नया कानून केंद्र के योगदान को और बढ़ाता है। पहले केंद्र का हिस्सा करीब 86,000 करोड़ था, अब यह लगभग 2.95 लाख करोड़ तक पहुंच रहा है। फंडिंग का अनुपात 60:40 ही है—जैसा अन्य केंद्रीय योजनाओं में होता आया है। पूर्वोत्तर, हिमालयी राज्य और जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10 का खास प्रावधान है। यानी केंद्र पीछे नहीं हट रहा, बल्कि राज्यों के साथ मिलकर जिम्मेदारी और जवाबदेही बढ़ा रहा है।
एक बहुत अहम बदलाव यह है कि राज्यों को इजाजत है कि वे साल में 60 दिन (जैसे बुआई-कटाई के व्यस्त मौसम) तय कर सकें, जब मनरेगा का काम नहीं होगा। यह फैसला जिला, ब्लॉक या पंचायत स्तर पर हो सकता है। इससे किसानों को मजदूर नहीं छूटेंगे, खेती का काम बाधित नहीं होगा और रोजगार गारंटी कृषि के साथ तालमेल बिठाकर चलेगी।
पुराने दौर की बात करें तो यूपीए सरकार के समय मनरेगा में कई गंभीर कमियां थीं। 2005 में शुरू हुई योजना का वादा था 100 रुपये रोजाना मजदूरी पर 100 दिन का काम। लेकिन 2009 में ही मजदूरी को 100 रुपये पर फ्रीज कर दिया गया। महंगाई बढ़ती गई, लेकिन मजदूरी नहीं। कई राज्यों में फर्जी जॉब कार्ड, गलत एंट्री, देरी से भुगतान जैसी समस्याएँ आम थीं। कैग की 2013 की रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि लाखों फर्जी जॉब कार्ड थे, हजारों करोड़ बिना हिसाब के खर्च हुए, 23 राज्यों में मजदूरी रोकी गई और बिहार, यूपी, महाराष्ट्र जैसे गरीब राज्यों में सिर्फ 20% फंड ही खर्च हो पाया। यानी जरूरत सबसे ज्यादा वहाँ थी, लेकिन काम सबसे कम वहाँ हुआ।
नया कानून इन्हीं सबकों से सीखकर आया है। यह पुरानी कमजोरियों को दूर करता है, अधिकारों को मजबूत करता है, डिजिटल निगरानी बढ़ाता है और कल्याण व विकास को एक साथ जोड़ता है। अब रोजगार सिर्फ मजदूरी नहीं—यह तालाब, सड़क, चेक डैम, वाटर हार्वेस्टिंग, फल-फूल के बाग, पशुशाला जैसी संपत्तियाँ बनाकर लंबे समय तक आय का स्रोत बनेगा।
कुल मिलाकर, यह कानून न तो कल्याण को छोड़ रहा है, न विकास को। यह दोनों को एक-दूसरे का सहारा बना रहा है। मजबूत रोजगार गारंटी से परिवारों की आय बढ़ेगी, बेहतर बुनियादी ढांचे से गांवों की उत्पादकता बढ़ेगी और उत्पादकता बढ़ने से और ज्यादा रोजगार पैदा होगा। यह चक्र टूटने की बजाय मजबूत हो रहा है।
ग्रामीण भारत के लिए यह एक नया अध्याय है—जहाँ गारंटी सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि हकीकत में बदलेगी। जहाँ हर हाथ को काम मिलेगा, हर परिवार को सम्मान मिलेगा और हर गांव आत्मनिर्भर बनने की राह पर चलेगा। यह कानून सिर्फ एक कानून नहीं—यह ग्रामीण भारत के सपनों को नई उड़ान देने वाला एक मजबूत वादा है।
।।शिव।।
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