शिक्षक दिवस....ऋणी है आपके
सरकारी आयोजन था पर भाषण देने वाले बड़े निजी शिक्षण संस्थान के निदेशक थे,क्योंकि उस आयोजन के लिए जुटाई गई धन राशि उन निदेशक महोदय के द्वारा दी गयी थी,उनके पास में ही तीन बड़े विद्यालय चलते है।
आयोजन भी क्योंकि राज्य के शिक्षा विभाग से जुड़ा हुआ था इसलिए प्रदेश भर के शिक्षकों की बड़ी संख्या कार्यक्रम में थी ।
मंत्री जी की उपस्थिति में अपने प्रभावशाली अंग्रेजीदा भाषण में निजी शिक्षण संस्थान के निदेशक ने अपने शैक्षिक संस्थान की उपलब्धियों और अपने प्रयासों पर जोरदार भाषण दिया और इशारों इशारों में सरकारी शिक्षकों पर सवाल उठा दिए स्कूलों के हालात, गंदगी,अव्यवस्था,परिणाम, विद्यार्थियों की संख्या इन सब विषयों को लेकर उन्होंने कड़े प्रहार किए और मंत्री जी मंद मंद मुस्कुरा कर सामने बैठे शिक्षकों की ओर ही देख रहे थे ।
भाषण समाप्त हुआ तो वहां बैठे लोगों ने मंत्री जी को ताली बजाते देखकर तालियां बजानी शुरू कर दी ।
एक शिक्षिका ने उठकर सवाल पूछा सर! क्या आप बता पाएंगे कि आपके विद्यालय में कक्षा 9 में में प्रवेश लेने वाला विद्यार्थी आठवीं कक्षा में 35 परसेंट नंबर लेकर आए तो आप प्रवेश देते हैं?तो उन्होंने आंखें ततेर कर जवाब दिया -हम ऐसे लोगों को एंट्री भी नहीं देते ।
तो शिक्षिका ने दूसरा सवाल दाग दिया -यदि स्टूडेंट्स के माता-पिता अनपढ़ हो तो क्या आप उनका एडमिशन लेते हैं?
अब जवाब तो आया पर चेहरा देखने लायक था -कैसे सवाल कर रही हैं आप मुझसे, जिनके घर में एजुकेशन का माहौल नहीं है वह हमारे सिस्टम को कैसे फॉलो करेंगे ?
तीसरा सवाल उसी शिक्षिका ने दागा कि क्या आप आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चों का प्रवेश वरीयता के आधार पर लेते हैं ?
यह सवाल उन निदेशक महोदय के लिए असहनीय हो गया ।
उन्होंने कहा आपको क्या लगता है हम हमारे शिक्षण संस्थान बंद कर दें ? पूरा सभागृह उसी जबाब सुनने के लिए आतुर था मानो, और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सब उस शिक्षिका की ओर देख रहे थे ।
जिसने एहसास करा दिया था मंत्री जी को जो निजी शिक्षण संस्थान के निदेशक द्वारा उठाए गए सवालों पर सरकारी शिक्षकों की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रहे थे।
मैं आज शिक्षक दिवस के अवसर पर राजकीय विद्यालयों-महाविद्यालयों में अध्ययन कराने वाले सभी शिक्षकों को हृदय के अंतः करण से प्रणाम करते हुए अभिनंदन करना चाहूंगा।
वह हमारे समाज की वह धुरी है जो समाज में फैली आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के बावजूद शिक्षा तंत्र में राजनीतिक दखलंदाजी के बाद भी प्राण प्रण से जुटी है न्यूनतम व्यवस्थाओं में अधिकतम परिणाम देने के अपने प्रयासों में ।
बहुत सारे शिक्षक हैं जिन्होंने अपने विद्यालयों को परिणामकारी केंद्रों के रूप में तब्दील किया है।
किसी शिक्षक ने अपने नवाचार से विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ संस्कार और राष्ट्रवाद से जोड़ा है,तो किसी ने शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाकर अभिभावकों के साथ मिलकर संसाधन जुटाए, किसी ने विद्यालयों में अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर परिणामों को बदला है, किसी ने उस सरकारी विद्यालय को ही अपना 18 घंटे का कार्य स्थल बनाया है,कोई पेड़ लगाकर उस विद्यालय में सुंदर वातावरण बनाने में लगा है तो कोई अपने नवाचारों से समाज के लोगों का विद्यालय की ओर ध्यान आकर्षित करता है ।
निजी विद्यालयों में जब शिक्षक अभिभावक की बैठक होती है जिसको हम पीटीएम बोलते हैं तब हर अभिभावक जाना जरूरी होता है,वह अपने बच्चे की चिंता करता है ।
पर एक बार सोच कर देखिए सरकारी विद्यालयों में अभिभावकों की संख्या कितनी होती है जो अपने बच्चों की थाह लेने आते हो?
ऐसे में केवल अकेला शिक्षक है जो विद्यार्थी के लिए जीता है ।
मानो वह बॉर्डर पर खड़ा सैनिक हो और अकेला ही सरहद पर लड़ रहा हो।
उसे केवल विद्यालय की स्थानीय समस्याओं से ही दो-चार नहीं होना है उस क्षेत्र के सत्तारूढ़ दल के लोगों से भी दो चार होना है ।उसे सरकार के बड़े बाबू की एसी वाले बंद कमरे में बैठकर निकाले गए आदेशों से भी दो-चार होना है। उसे अपने विद्यालय को चलाने के अलावा गांव में कितनी गाय भैंस बकरी है इसकी गणना भी करनी है, उसे मतदाताओं की संख्या भी जाननी है, उसे पल्स पोलियो की खुराक देने भी जाना है ।
उसे विद्यालय खोलने के साथ ही बच्चों को दूध पिलाने की जिम्मेदारी भी निभानी है । उस शिक्षक को दोपहर के भोजन के लिए परचून की दुकान से परचून भी खरीदना है ,कभी ईंधन अपनी गाड़ी में रख कर लाना है ।
उसे पिछले दिनों 4 बार भेजी गई सूचना को पांचवीं वार फिर भेजना है, सत्तारूढ़ दल के कारिंदों कि वह सब बातें सुननी है जो व्यक्तिगत रूप से उसे उचित नहीं लगती ।
उसे उस पटवारी से भी डरना है, उस ग्रामसेवक से भी डरना है जो उससे शासकीय ग्रेड में नीचे हैं पर वह कभी भी उसका निरीक्षण करके रपट तैयार कर सकता है। उसे उस तहसीलदार के सामने हाथ जोड़कर खड़े होना है जो पे स्केल के मामले में उसके बराबर भी नहीं है।
उसे वह सब कुछ करना है जिसकी उसका दिल गवाही नहीं देता,पर उसे वह भी करना है जिसके लिए वह शिक्षक बना है ।इसलिए वह सब कुछ सहन करता है अपने विद्यार्थियों को पढ़ाता है, जब भी उसे सरकारी तामझाम की खानापूर्ति से समय मिल जाता है ।
आज शिक्षक दिवस पर मैं सभी शिक्षकों को अनेकानेक शुभकामनाएं देता हूं,मैं जानता हूं क्योंकि मैं एक सरकारी विद्यालय में पढा हुआ विद्यार्थी हूँ। मैंने सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के दर्द को नजदीक से महसूस किया है क्योंकि मेरे बहुत सारे मित्र शिक्षा विभाग से जुड़े हुए है ।
मेरा मानना है कि जब तक शिक्षा राजनीति से मुक्त और प्रशासनिक स्तर पर स्वयं शिक्षकों द्वारा नियंत्रित नहीं होगी तब तक इसमें ऐसी ही हठधर्मिता और प्रयोग धर्मिता के नाम पर नए नए चोचले होते रहेंगे।
एक बार फिर राजकीय विद्यालय में कार्यरत उन सभी शिक्षकों का हृदय से अभिनंदन जो लोकहितम मम करणीयम के संकल्प के साथ शिक्षा के माध्यम से,ज्ञान का उजियारा चारों दिशा में फैलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं,संकल्पित हैं।
शिक्षक से राष्ट्रपति बने सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर उनका भी पुण्य स्मरण करता हूं।
मैं राज्य के लाखों शिक्षकों में स्पष्ट देख रहा हूं जो कह सकते हैं चाणक्य की तरह
"मुझे चिंता या भीख की आवश्यकता नहीं धनानंद,
मैं शिक्षक हूँ ,यदि मेरी शिक्षा में सामर्थ्य है तो अपना पोषण करने वाले सम्राटों का निर्माण मैं स्वयं कर लूँगा।"
।।शिव।।
आयोजन भी क्योंकि राज्य के शिक्षा विभाग से जुड़ा हुआ था इसलिए प्रदेश भर के शिक्षकों की बड़ी संख्या कार्यक्रम में थी ।
मंत्री जी की उपस्थिति में अपने प्रभावशाली अंग्रेजीदा भाषण में निजी शिक्षण संस्थान के निदेशक ने अपने शैक्षिक संस्थान की उपलब्धियों और अपने प्रयासों पर जोरदार भाषण दिया और इशारों इशारों में सरकारी शिक्षकों पर सवाल उठा दिए स्कूलों के हालात, गंदगी,अव्यवस्था,परिणाम, विद्यार्थियों की संख्या इन सब विषयों को लेकर उन्होंने कड़े प्रहार किए और मंत्री जी मंद मंद मुस्कुरा कर सामने बैठे शिक्षकों की ओर ही देख रहे थे ।
भाषण समाप्त हुआ तो वहां बैठे लोगों ने मंत्री जी को ताली बजाते देखकर तालियां बजानी शुरू कर दी ।
एक शिक्षिका ने उठकर सवाल पूछा सर! क्या आप बता पाएंगे कि आपके विद्यालय में कक्षा 9 में में प्रवेश लेने वाला विद्यार्थी आठवीं कक्षा में 35 परसेंट नंबर लेकर आए तो आप प्रवेश देते हैं?तो उन्होंने आंखें ततेर कर जवाब दिया -हम ऐसे लोगों को एंट्री भी नहीं देते ।
तो शिक्षिका ने दूसरा सवाल दाग दिया -यदि स्टूडेंट्स के माता-पिता अनपढ़ हो तो क्या आप उनका एडमिशन लेते हैं?
अब जवाब तो आया पर चेहरा देखने लायक था -कैसे सवाल कर रही हैं आप मुझसे, जिनके घर में एजुकेशन का माहौल नहीं है वह हमारे सिस्टम को कैसे फॉलो करेंगे ?
तीसरा सवाल उसी शिक्षिका ने दागा कि क्या आप आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चों का प्रवेश वरीयता के आधार पर लेते हैं ?
यह सवाल उन निदेशक महोदय के लिए असहनीय हो गया ।
उन्होंने कहा आपको क्या लगता है हम हमारे शिक्षण संस्थान बंद कर दें ? पूरा सभागृह उसी जबाब सुनने के लिए आतुर था मानो, और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सब उस शिक्षिका की ओर देख रहे थे ।
जिसने एहसास करा दिया था मंत्री जी को जो निजी शिक्षण संस्थान के निदेशक द्वारा उठाए गए सवालों पर सरकारी शिक्षकों की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रहे थे।
मैं आज शिक्षक दिवस के अवसर पर राजकीय विद्यालयों-महाविद्यालयों में अध्ययन कराने वाले सभी शिक्षकों को हृदय के अंतः करण से प्रणाम करते हुए अभिनंदन करना चाहूंगा।
वह हमारे समाज की वह धुरी है जो समाज में फैली आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के बावजूद शिक्षा तंत्र में राजनीतिक दखलंदाजी के बाद भी प्राण प्रण से जुटी है न्यूनतम व्यवस्थाओं में अधिकतम परिणाम देने के अपने प्रयासों में ।
बहुत सारे शिक्षक हैं जिन्होंने अपने विद्यालयों को परिणामकारी केंद्रों के रूप में तब्दील किया है।
किसी शिक्षक ने अपने नवाचार से विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ संस्कार और राष्ट्रवाद से जोड़ा है,तो किसी ने शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाकर अभिभावकों के साथ मिलकर संसाधन जुटाए, किसी ने विद्यालयों में अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर परिणामों को बदला है, किसी ने उस सरकारी विद्यालय को ही अपना 18 घंटे का कार्य स्थल बनाया है,कोई पेड़ लगाकर उस विद्यालय में सुंदर वातावरण बनाने में लगा है तो कोई अपने नवाचारों से समाज के लोगों का विद्यालय की ओर ध्यान आकर्षित करता है ।
निजी विद्यालयों में जब शिक्षक अभिभावक की बैठक होती है जिसको हम पीटीएम बोलते हैं तब हर अभिभावक जाना जरूरी होता है,वह अपने बच्चे की चिंता करता है ।
पर एक बार सोच कर देखिए सरकारी विद्यालयों में अभिभावकों की संख्या कितनी होती है जो अपने बच्चों की थाह लेने आते हो?
ऐसे में केवल अकेला शिक्षक है जो विद्यार्थी के लिए जीता है ।
मानो वह बॉर्डर पर खड़ा सैनिक हो और अकेला ही सरहद पर लड़ रहा हो।
उसे केवल विद्यालय की स्थानीय समस्याओं से ही दो-चार नहीं होना है उस क्षेत्र के सत्तारूढ़ दल के लोगों से भी दो चार होना है ।उसे सरकार के बड़े बाबू की एसी वाले बंद कमरे में बैठकर निकाले गए आदेशों से भी दो-चार होना है। उसे अपने विद्यालय को चलाने के अलावा गांव में कितनी गाय भैंस बकरी है इसकी गणना भी करनी है, उसे मतदाताओं की संख्या भी जाननी है, उसे पल्स पोलियो की खुराक देने भी जाना है ।
उसे विद्यालय खोलने के साथ ही बच्चों को दूध पिलाने की जिम्मेदारी भी निभानी है । उस शिक्षक को दोपहर के भोजन के लिए परचून की दुकान से परचून भी खरीदना है ,कभी ईंधन अपनी गाड़ी में रख कर लाना है ।
उसे पिछले दिनों 4 बार भेजी गई सूचना को पांचवीं वार फिर भेजना है, सत्तारूढ़ दल के कारिंदों कि वह सब बातें सुननी है जो व्यक्तिगत रूप से उसे उचित नहीं लगती ।
उसे उस पटवारी से भी डरना है, उस ग्रामसेवक से भी डरना है जो उससे शासकीय ग्रेड में नीचे हैं पर वह कभी भी उसका निरीक्षण करके रपट तैयार कर सकता है। उसे उस तहसीलदार के सामने हाथ जोड़कर खड़े होना है जो पे स्केल के मामले में उसके बराबर भी नहीं है।
उसे वह सब कुछ करना है जिसकी उसका दिल गवाही नहीं देता,पर उसे वह भी करना है जिसके लिए वह शिक्षक बना है ।इसलिए वह सब कुछ सहन करता है अपने विद्यार्थियों को पढ़ाता है, जब भी उसे सरकारी तामझाम की खानापूर्ति से समय मिल जाता है ।
आज शिक्षक दिवस पर मैं सभी शिक्षकों को अनेकानेक शुभकामनाएं देता हूं,मैं जानता हूं क्योंकि मैं एक सरकारी विद्यालय में पढा हुआ विद्यार्थी हूँ। मैंने सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के दर्द को नजदीक से महसूस किया है क्योंकि मेरे बहुत सारे मित्र शिक्षा विभाग से जुड़े हुए है ।
मेरा मानना है कि जब तक शिक्षा राजनीति से मुक्त और प्रशासनिक स्तर पर स्वयं शिक्षकों द्वारा नियंत्रित नहीं होगी तब तक इसमें ऐसी ही हठधर्मिता और प्रयोग धर्मिता के नाम पर नए नए चोचले होते रहेंगे।
एक बार फिर राजकीय विद्यालय में कार्यरत उन सभी शिक्षकों का हृदय से अभिनंदन जो लोकहितम मम करणीयम के संकल्प के साथ शिक्षा के माध्यम से,ज्ञान का उजियारा चारों दिशा में फैलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं,संकल्पित हैं।
शिक्षक से राष्ट्रपति बने सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर उनका भी पुण्य स्मरण करता हूं।
मैं राज्य के लाखों शिक्षकों में स्पष्ट देख रहा हूं जो कह सकते हैं चाणक्य की तरह
"मुझे चिंता या भीख की आवश्यकता नहीं धनानंद,
मैं शिक्षक हूँ ,यदि मेरी शिक्षा में सामर्थ्य है तो अपना पोषण करने वाले सम्राटों का निर्माण मैं स्वयं कर लूँगा।"
।।शिव।।
Comments