श्राद्ध के बहाने, जड़ों की ओर लौटे....
16 दिन तक चला श्रद्धा और परंपरा के विश्वास से गूंथा अपने पूर्वजों को ऋणी भाव से याद करने का पर्व आज पूर्ण हुआ।
पुरातन के प्रति श्रद्धा,पूर्वजों के प्रति ऋण का भाव,भावी पीढ़ी को भूत से जोड़ने का वर्तमान का स्तुत्य प्रयास का दूसरा नाम है श्राद्ध पक्ष।
एक एक दिन मनाने की जद्दोजहद में जुटी विश्व बिरादरी के लिए यह कौतूहल का विषय हो सकता है, क्योंकि उनके लिए जिंदा माँ-बाप का मूल्य उनकी उपयोगिता से जोड़ा जाता है,वहां व्यक्ति की चिंता हुई,समष्टि की नहीं...
वहां व्यक्ति के जीवन मूल्यों से बड़ा जीडीपी हो गयी,व्यक्ति का जीडीपी में क्या योगदान है,इससे गणना ने व्यक्ति को व्यक्ति से दूर किया....वे दुःखी है,अशांत है....वे भारत की परंपराओं को समझकर जुड़ना चाहते हों....
और हमें देखो...आजकल परम्परा को गाली देने की फैशन में लगा है....यह चोंचले लगने लगे,क्योंकि वर्तमान पीढ़ी ने इसे इसी रूप में परिचय करवाया,नई पीढ़ी यदि आपकी परम्पराओं को दरकिनार कर रही है,तो वर्तमान अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता....
वर्तमान ने इसे पंडितजी को भोजन तक सीमित किया और कुछ पंडितजी ने इसे दान दक्षिणा तक....
यह पर्व पंडितजी को भोजन तक सीमित नहीं बल्कि भविष्य को वर्तमान के माध्यम से पुरातन को जोड़ने का पर्व था।
क्या कभी सोचा है,श्राद्ध करते समय पितृ पक्ष की तीन पीढ़ियों,मातृ पक्ष की तीन पीढ़ियों का सगौत्र स्मरण कर तर्पण का विधान क्यों किया गया...?
उदाहरण के लिए रमेश के पिताजी सुरेशजी ने अपने पिताजी महेश जी का श्राद्ध किया तो महेशजी के पिताजी,फिर उनके पिताजी,फिर उनके पिताजी का स्मरण करते हुए तर्पण का विधान है.....
इसी तरह यदि माँ का करते तो अपनी तीन पीढ़ी की माताओं और माँ की माताजी,उनकी माताजी और उनकी माताजी का पुण्य स्मरण करने का विधान होता है....
हमारे यहाँ किसी भी पूजा के विधान में संकल्प का प्रावधान है,जिसमें ऋषि गोत्र का उल्लेख होता है।
आइये,जाने क्या है ये ऋषि गोत्र....
क्यों रखे गए गौत्र..?
गोत्र रखने का पहला कारण : गोत्र पहले सामाजिक एकता का आधार था, लेकिन अब नहीं। गोत्र क्यों जरूरी था? वह इसलिए कि एक ही कुल से कोई ब्राह्मण होता था तो कोई क्षत्रिय, तो कोई वैश्य और कोई शूद्र कर्म करता था। ऐसे में गोत्र से ही उसकी पहचान होती थी। अब आप ही इसकी खोज कीजिए कि क्या कौरव और पांडव क्षत्रिय थे? क्या वाल्मीकि ब्राह्मण थे? वर्तमान युग के हिसाब से कृष्ण कौन थे? यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारे ऋषि-मुनि वर्तमान में प्रचलित किसी भी वर्ण या जाति के नहीं थे।
पहले तो ऐसा था कि क्षत्रिय और ब्राह्मण आपस में विवाह करते थे, लेकिन गोत्र देखकर। और यदि क्षत्रिय का गोत्र भी भारद्वाज और ब्राह्मण का गोत्र भी भारद्वाज होता था तो यह विवाह नहीं होता था, क्योंकि ये दोनों ही भारद्वाज ऋषि की संतानें हैं। पहले ये चार वर्ण कर्म पर और बौद्धकाल में ये जाति पर आधारित हो गए। जब से ये जाति पर आधारित हुए हैं हिन्दू समाज का पतन होना शुरू हो गया।
गोत्र रखने का दूसरा कारण : गोत्र को शुरुआत से ही बहुत महत्व दिया जाता रहा है। बहुत से समाज ऐसे हैं, जो गोत्र देखकर ही विवाह करते हैं। आपने विज्ञान में पढ़ा होगा गुणसूत्र (Chromosome) के बारे में। गुणसूत्र का अर्थ है वह सूत्र जैसी संरचना, जो संतति में माता-पिता के गुण पहुंचाने का कार्य करती है।
गुणसूत्र की संरचना में दो पदार्थ विशेषत: संमिलित रहते हैं- (1) डिआक्सीरिबोन्यूक्लीइक अम्ल (Deoxryibonucleic acid) या डीएनए (DNA), तथा (2) हिस्टोन (Histone) नामक एक प्रकार का प्रोटीन। इसकी व्याख्या बहुत विस्तृत है। खैर..
प्रत्येक जोड़े में एक गुणसूत्र माता से तथा एक गुणसूत्र पिता से आता है। इस तरह प्रत्येक कोशिका में कुल 46 गुणसूत्र होते हैं जिसमें 23 माता व 23 पिता से आते हैं। जैसा कि कुल जोड़े 23 है। इन 23 में से एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है। यह होने वाली संतान का लिंग निर्धारण करता है अर्थात पुत्र होगा या पुत्री।
यदि इस एक जोड़े में गुणसूत्र xx हो तो संतान पुत्री होगी और यदि xy हो तो संतान पुत्र होगी। परंतु दोनों में x समान है, जो माता द्वारा मिलता है और शेष रहा वो पिता से मिलता है। अब यदि पिता से प्राप्त गुणसूत्र x हो तो xx मिलकर स्त्रीलिंग निर्धारित करेंगे और यदि पिता से प्राप्त y हो तो पुल्लिंग निर्धारित करेंगे। इस प्रकार x पुत्री के लिए व y पुत्र के लिए होता है। इस प्रकार पुत्र-पुत्री का उत्पन्न होना माता पर नहीं, पूर्णतया पिता से प्राप्त होने वाले x अथवा y गुणसूत्र पर निर्भर होता है।
तो महत्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ, क्योंकि y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत हैं कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है। बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य था, जो हमारे ऋषियों ने जान लिया था। यह पूर्णत: एक वैज्ञानिक पद्धति थी। वैज्ञानिक कहते हैं कि गुणसूत्रों के बदलावा से कई तरह की बीमारियों का विकास होता है। इसलिए विवाह के दौरान जहां गोत्र देखा जाता है वहीं ज्योतिष पद्धति अनुसार गुणों का मिलान भी होता है।
वर्तमान के वैज्ञानिक गुणसूत्रों को बदलने का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए पहले पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के गुणसूत्रों में बदलावा करके एक नई जाति बनाने का प्रयास किया है। मनुष्य के गुण सूत्रों के हेर-फेर से जो परिणाम सामने आए उनसे स्पष्ट है कि बिगाड़ने में अधिक और बनाने में कम सफलता मिली है।
विज्ञान जिसे स्वीकार कर रहा है,उसे चोचले कह कर मत नकारिये.... परम्परा से जुड़िये,मेरा मानना है,कि पूरे देश में एक अभियान चले, back to Root... जड़ों की ओर लौटे...
।।शिव।।
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