समझदारी से निर्णय

 बंदरों का एक बड़ा कुनबा घने जंगल में रहता था। उनका नेता शक्तिशाली,समझदार और अपनी उदारता,बुद्धिमत्ता के लिए जाना जाता था।

वह अपनी प्रजा को उनकी सुरक्षा के बारे में हर तरह के निर्देश देता और उनकी रक्षा करता। एक दिन युवा और तरुण टोली को समझाते हुए उसने कहा, “मेरे दोस्तो, जंगल में किसी भी नई चीज को खाने या पीने से पहले उसकी जांच अवश्य कर लें या फिर उसके बारे में मुझसे पूछ लें।” सारे बंदर अपने नेता की बात समझ गए।



एक दिन बंदरों का समूह अपने भोजन की तलाश में एक ऐसे शांत व सुंदर तालाब के पास पहुंचे, जिसके आसपास लंबे बांसों का झुंड था। उन्हें बहुत प्यास लगी थी। पानी पीने के लिए वे वहां रुकने लगे, तभी एक बंदर चिल्लाया, “रुको! तुम्हें याद नहीं कि हमारे नेता ने क्या कहा था?” 

“नहीं! हमें सब कुछ याद है। हम अपने नेता के आने तक तालाब से पानी नहीं पीएंगे,” सभी ने एक आवाज में आश्वासन दिया। अपने संकेत से उन्होंने अपने नेता को संदेश भेजे और सब वहीं बैठ कर इंतजार करने लगे। 

जब उनका नेता वहां आया तो उसने तालाब का एक चक्कर काटा और उसके आसपास की जमीन को ध्यान से देखा, जांचा-परखा।

 फिर वह वहां गया जहां सारे बंदर उसका इंतजार कर रहे थे। उसने कहा, “दोस्तो, यहां पानी की ओर जाने वाले पैरों के निशान तो दिख रहे हैं, लेकिन उस ओर से वापस आने वाले पैरों के निशान नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस तालाब के पानी में मत जाना। मुझे लगता है कि इसमें कोई शैतान रहता है जो पानी पीने के लिए आने वालों को निगल लेता है। यही वजह है कि वहां से वापस आने वाले जानवरों के पैरों के निशान नहीं दिखाई दे रहे। ऐसा लगता है कि कोई तालाब से जिंदा वापस ही नहीं आता।” सारे बंदर बहुत थके हुए थे इसलिए वे वहीं चुपचाप बैठ गए। 

कुछ ही देर बाद, उन्होंने पानी से एक भयंकर राक्षस को बाहर आते देखा। वह सफेद चेहरे, बड़े से पेट, हरी आंखों, लाल पंजों तथा तेज नुकीले दांतों वाला एक भयंकर राक्षस था। वह गरजा, “तुम लोग पानी क्यों नहीं पी रहे? तुम तो प्यासे हो, तुम्हें पानी अवश्य पीना चाहिए।” इसके बाद वह तालाब में वापस लौट गया। 

प्यासे बंदरों ने अपने नायक की ओर देखा और नायक ने बांसों की ओर। बांसों में गांठें थीं इसलिए वे अंदर से खोखले नहीं थे। नेता बुद्धिमान था। उसने बांस में एक छड़ी डाल कर घुमाई तो उसकी सभी गांठ खुल गईं और वह पूरी तरह से खोखला हो गया। अब उस बांस की मदद से, दूर खड़े हो कर ही, तालाब से पानी पीया जा सकता था। 

जब वह उस बांस से पानी पीने लगा तो एक करिश्मा हुआ। बाकी बांसों की गांठें भी अपने-आप खुल गईं। अब सारे बंदर उनसे पानी पी सकते थे। सभी ने तालाब के जल में घुसे बिना दूर बैठकर अपनी प्यास बुझाई। 

इस तरह उनके नेता ने उन्हें सीखा दिया था कि किसी भी नई स्थिति का सामना करने से पहले भली प्रकार से उसकी जांच कर लेनी चाहिए। जो लोग कोई भी निर्णय लेते समय अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करते, वो स्वयं विपत्ति को बुलावा देते हैं, उसमें फंसते हैं और फिर नष्ट हो जाते हैं।

आइये,विपत्तिकाल में समझदारी से निर्णय करें....हमारा एक सही निर्णय हमें और हमारे परिवार को सुरक्षित कर सकता है.....एक गलत निर्णय सब कुछ खत्म कर देता है।

आपके हर निर्णय से आपका,आपके परिवार का और समाज राष्ट्र का भला हो,यही बाबा हनुमन्तलालजी से प्रार्थना है।

।।शिव।।

Comments

बहुत बढ़िया 👍👍🌹🌹
Manoj said…
प्रेरणादायक
Niranjan sharma said…
Mama ji aapki stories bahot achi hoti hai or khfi inspirational bhi hoti hai

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