सच टिफिन का
नये घर में आये मुझे थोड़े ही दिन हुए थे। सामने वाले घर की हीरक जयंती मना चुकी गोमती दादी को देखकर बहुत ख़ुश होती थी,जब भी दादी से बात होती, उनसे हमेशा कुछ न कुछ सीख मिल ही जाती थी।
दादी अकेली रहती थीं, ऐसा नहीं कि उनका कोई नहीं था।भरापूरा घर-परिवार था, पर अलग-अलग रहता था। दादी का एक बेटा बेंगलुरु में, तो दूसरा उसी घर में अपने परिवार के साथ ऊपर के पोर्शन में रहता।
मुझे अपनी छत के एक कोने से दिखाई देता रहता कि दादी का पोता दादी के लिए खाने का टिफिन नीचे लेकर आया करता।
मुझे यह देखकर अच्छा लगता कि चलो, दादी के खाने-पीने का ध्यान बेटा अलग रहकर भी करता है।
दादी भी हमेशा मस्त अंदाज़ में कहतीं, ”मुझे खाने-पीने का बहुत शौक है, जो मन करता है, कहकर बनवा लेती हूं।‘’
मैं दादी से बहुत बातें करती,जब भी मौका मिलता मैं भागकर पहुंच जाती उनके पास,तो कभी वे आवाज़ लगा देती मेरे गेट पर आकर।
दादी हमेशा अपने बेटे-बहू, पोते-पोती की तारीफ़ ही करतीं रहती,उनको जितना मैंने जाना उतना ही उनसे जुड़ती गयी।
दादी के बेटा-बहू मुझे रूखे से इंसान लगते,कभी उन्हें अपनी माँ के साथ कहीं आते-जाते, हंसते-बोलते नहीं देखा था, पर दादी थी कि इतने शौक से बताती कि आज टिफिन में क्या था, क्या चीज़ अच्छी बनी थी, क्या चीज़ बहुत दिनों बाद खाई।
मेरे पति शिवांश जब घर होते, दादी की बात करती, तो वे कहते, ”जाह्नवी, तुम्हारी दादी तो तुम्हारे सिर चढ़कर बोलती हैं, इतना दिल मत लगाओ उनसे, हम किराएदार हैं, यहां से जाना होगा, तो दादी को याद करके फिर उदास रहोगी।”
”क्या करूं शिवांश, दादी इस उम्र में भी कितनी ज़िंदादिल हैं, एक अक्षय ऊर्जा का स्रोत है।यहां तो अपने रिश्तेदार ही दूर हो गए, सब के सब मतलब के दोस्त थे.” मैं अपने पुराने ज़ख़्म याद कर उदास हो जाती।
एक बार यूं ही सर्दियों की एक शाम को दादी से मिलने उनके घर गई, उनकी गैलरी में उसे दादी और उनके पोते की आवाज़ सुनाई दी.
पोता राकेश कह रहा था, ”दादी, इस बार आपने अभी तक टिफिन के पैसे नहीं दिए. पापा ने कहा है कि महीने की पांच तारीख़ हो गई, पेंशन तो आ गई होगी? और पापा ने यह भी कहा है कि महंगाई बहुत बढ़ गई है, अब एक हज़ार नहीं, दो हज़ार दिया करना टिफिन के लिए।’
”अरे, इतना महंगा? इससे अच्छा तो मैं सामनेवाली गली से टिफिन मंगा लूंगी, मुझे सस्ता पड़ेगा।‘’
”सोच लो दादी, हम वही बना कर देते हैं, जो आप कहती हैं बिना मिर्च-मसाले का खाना, आपको ऐसा घर जैसा खाना बाहर मिल जाएगा?”
”हां, ये बात भी है, पर जाकर पूछ कर आ कि डेढ़ हज़ार चलेगा?”
”ठीक है, पूछ कर आता हूं.” कहकर राकेश जाने के लिए मुड़ा, तो मैं तुरंत चुपचाप वापस लौट आई। आज आंखे भर गई थी,उनके घर से अपने घर तक आना कई किलोमीटर की यात्रा सा लग रहा था।
मन किया कि दौड़ कर जाए और दादी को अपने सीने से लगा ले, पर नहीं दादी के झूठ का भ्रम रखने के लिए भारी मन से घर की तरफ़ चलती रही। काकी के टिफिन के स्वाद का सच बहुत कसैला था…
अब भी वक्त है दरकते रिश्तों की सिसकियां हम सुन ले नहीं तो टूटते रिश्तों की कराह सुनने को बेबस होंगे....,अपने अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर यह पीढ़ी तो सिसकियों को सहन कर लेगी पर टूटते परिवारों,रिश्तों का दर्द-दंश झेलकर आने वाली पीढ़ी मानवीय गुणों से दूर हो जाएगी....मानव से मशीन में तब्दील हो जाएगी।
अब भी वक्त है संभाल लीजिए....सम्भल जाइये...
आपके परिवार में श्री रामायण जी का भ्रातृत्व,ममता,सम्मान,एक दूजे के प्रति सहकार का संस्कार मंत्र गुंजित हो....यही बाबा हनुमन्तलालजी से प्रार्थना है।
।।शिव।।
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