सब में राम

 आश्रम में गुरु से शिक्षा प्राप्त कर एक शिष्य अपने घर की ओर लौट रहा था।रास्ते में एक लड़का मिला-कहाँ जा रहे हो वटुक? आगे एक हाथी पागल हो गया है वो आ रहा है,,

शिष्य ने उसकी ओर देखा एक पल के लिए सोचकर गर्दन को झटका दिया और आगे बढ़ गया...उसे आगे बढ़ते देख एक बुजुर्ग महिला जो अपने भवन की छत्त से देख रही थी बोली-आगे मत जाओ बालक, राह में पागल हाथी आ रहा है,तनिक सुरक्षित रहकर विश्राम कर लो।

शिष्य ने सुना पर अनसुना कर दिया।

सामने देखा तो हाथी दौड़ता हुआ आ रहा था,महावत बार बार अंकुश से रोकने की कोशिश कर रहा था तो दूसरी ओर शिष्य रास्ते पर बिना रुके आगे बढ़ रहा था। हर आवाज को दरकिनार करते हुए ...।

हाथी नजदीक आ रहा था, लोग आवाज़ लगा रहे थे,पर सबको सुनकर भी अनसुना कर रहा था। महावत ने ऊपर से हाथी पर अंकुश से प्रहार करते हुए कहा-हट जाओ,हाथी मार देगा,पगला गया है,हाथ जोड़कर कह रहा हूँ सुन लो।

पर शिष्य तो बेख़ौप आगे और आगे....पल पल हाथी के पास जाता जा रहा था।

आखिर वो पल आ ही गया,हाथी जोर से चिघाड़ा और अपनी लंबी सूंड के एक प्रहार से शिष्य को उछाल दिया।देखते ही देखते शिष्य सूखे पत्ते सा आसमान में उड़ता हुआ एक घास की ढेरी पर पड़ा कराह रहा था।

लोग भाग कर गए,उसे सम्भाल कर पास के ओषधालय में ले गए,। उपचार शुरू हुआ और उधर आश्रम पर सूचना मिलने पर गुरुवर आये ।

गुरुदेव को देखते ही शिष्य की कराह और क्रोध का समवेत स्वर गूंज गया।

गुरुदेव आपने गलत पढ़ाया। गुरुदेव आश्चर्य से अपने शिष्य की ओर देख रहे थे।

वो बोल रहा था,आपने श्रीरामचरितमानस पढ़ाते हुए कहा था कि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा था



सिय राम मय सब जग जानी, 

करहु प्रणाम जोरी जुग पानी !!

अर्थात:- पूरे संसार में श्री राम का निवास है, सब में भगवान हैं और हमें उनको हाथ जोड़कर प्रणाम कर लेना चाहिए !!

तब गुरुदेव ने कहा -हां, पुत्र यही पढ़ाया था। यह गलत नहीं है

मैंने आपकी इसी बात पर भरोसा करके कि सब में राम का वास है मैं उस हाथी को हाथ जोड़ लूँगा और शान्ति से चला जाऊंगा !! पर हाथी ने मुझे इस हालत में  पहुंचा दिया।

अब गुरुदेव के पूरी बात समझ में आ गई,वे बोले पुत्र ये चौपाई तो शत प्रतिशत सही है ।

आपने उस हाथी में तो श्री राम को देखा लेकिन उस बच्चे में,उस माता में,उस दूर खड़े व्यक्ति में, उस महावत में श्रीराम को नहीं देख पाए, जो आपको बचाने के लिए बार बार कह रहे ।

"भगवान तो उन सबके रूप में आपके पास पहले ही आये थे लेकिन आपने देखा ही नहीं "।

ऐसा सुनते ही शिष्य गुरुदेव से क्षमा याचना करते उनके चरणों में गिर गया।

" घर पर रहें,,,,,,शायद यही राम जी की इच्छा हो,,,," 

" जो प्रशासन ने कहा, वो हो सकता है कि राम जी ने ही कहा हो,,,,,,,"

गंगा बड़ी न गोदावरी, न तीर्थ बड़े प्रयाग। 

सकल तीर्थ का पुण्य वहीं, जहाँ हृदय राम का वास !!

आप सबके हृदय कमल में विराजित श्रीजनकीनाथ को प्रणाम।

आइये,रामजी की इच्छा स्वीकार कर कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करें। अपने रामजी तो मर्यादा पुरुषोत्तम है,फिर हम मर्यादाओं की अवहेलना कर उनको प्रसन्न कैसे कर सकते है।

बाबा हनुमन्तलालजी से आपके स्वास्थ्य की कामना के साथ-

।।शिव।।

Comments

Sangeeta tak said…
कण कण में प्रभु श्री राम��
सुन्दर और प्रेरणास्पद कहानी साथ सटीक सन्देश
सुन्दर कथा

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