लक्ष्य

 पुराने जमाने की बात है,राजगढ़ के राजा राघवेंद्र सिंह थे। उनके कोई संतान नहीं थी, इसको लेकर भी बड़े चिंतित रहा करते थे ।उन्हें अपने राज्य के उत्तराधिकारी को लेकर बड़ी चिंता हुआ करती थी ।



इस विषय पर उन्होंने अपने सलाहकारों और मंत्रियों से चर्चा की.... उन सबने महाराज राघवेंद्र सिंह को सुझाव दिया कि अपने उत्तराधिकारी का चयन वे प्रजा में से किसी योग्य व्यक्ति  का करें ।

महाराज राघवेंद्र सिंह ने एक दिन अपनी राज सभा में घोषणा की, कि आम प्रजा में से जो व्यक्ति कल मुझे राजभवन में सबसे पहले मिलेगा उसे मेरा उत्तराधिकारी बना दिया जाएगा ।

राज्य के महामंत्री महेंद्र प्रताप सिंह ने महाराज से कहा - महाराज आसान काम हो गया यह तो,कोई भी आपसे मिल लेगा ।

महाराज ने कहा-महामंत्री जी,आप चिंता मत कीजिये,आप आयोजन की तैयारी कीजिये।राज्य को कल उत्तराधिकारी मिल जाएगा ।

पूरे राज्य में मुनादी करवा दी गई कि जो कल महाराज से मिलेगा उसे राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया जाएगा।

अगले दिन सुबह राजभवन के सामने बड़ी संख्या में युवक आए थे ।सबके मन में इच्छा थी इतने बड़े राज्य का उत्तराधिकारी बनने की ।

राज भवन के द्वार खोले गए और सब युवाओं को राज भवन में प्रवेश करवाया गया।राज भवन में प्रवेश करते ही एक बड़े मेले का आयोजन था जिसमें विभिन्न प्रकार के पकवान,आदर सत्कार के सब संसाधन, नृत्य,गीत-संगीत, विलासिता से जुड़ी हुई हर वस्तु वहां रखी गई थी ।

युवाओं ने जब इतना वैभव देखा तो वे मेले की ओर दौड़ पड़े।

बस एक युवक उद्यान की तरफ नहीं जाकर राजभवन के महल की ओर बढ़ने लगा...दो जगह सुरक्षाकर्मियों ने उसको रोका पर अपने कौशल से वह सुरक्षा प्रहरियों से बचते हुए सीधा राजा के सामने उपस्थित हो गया। 

महाराज राघवेंद्र सिंह ने अपनी राज सभा में कहा कि जितने लोग आए थे,उनमें से केवल एक इस युवक को छोड़कर बाकी सब का लक्ष्य उत्तराधिकार प्राप्त करना नहीं था बल्कि वे भोग विलासिता में डूबे रहना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मेले में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करना ज्यादा जरूरी समझा ना कि अपने लक्ष्य की ओर ध्यान दिया ।

यह युवक राज्य के लिए उपयुक्त उत्तराधिकारी है और मैं इसे युवराज घोषित करता हूं।

मूल उद्देश्य को भूलकर मंजिल की राह में आये पड़ाव को मंजिल समझने की भूल करना नुकसानदेह होता है औऱ लक्ष्य प्राप्ति के लिए ध्येय किये गए प्राणप्रण प्रयास सफल होते है।

आप स्वस्थ रहे और हमेशा श्री-यश को अर्जित करें,यही बाबा हनुमन्तलालजी से प्रार्थना है।

।।शिव।।


Comments

लक्ष्य को समर्पित आपकी कहानी ज्ञानवर्धक है
एक और प्रेरणादायक कहानी 👍👍
Unknown said…
प्रेरक, ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद कहानी।
Manoj said…
बहुत सुंदर प्रेरक कहानी...
Shiv Sharma said…
बहुत सुंदर और प्रेरणादायक
Yogesh Goswami said…
ध्येय एक ही होना चाहिये। लाजवाब👏👏👏

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