सद कार्यों की कड़ी
देव नगर में जीवानंद नाम के एक सेठ रहते थे। वो आर्थिक रूप से तो सक्षम थे ही इसके साथ साथ आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से मजबूत थे।उनके द्वारा अपने धन का सदुपयोग हमेशा जनकल्याण के कामों में किया जाता था। उनके यहां काम करने वाले सेवादार भी पूरा सम्मान पाते थे ।चींटी को दाना से लगाकर हाथी के लिए खाने की प्रबंध तक बेशक ध्यान रखते थे ,अगर कोई उनके दरवाजे पर आता था।
उनके बारे में कहा जाता था कि सेठ जी के यहां कोई आया तो चींटी के लिए कण और हाथी के लिए मण सब व्यवस्थाएं हो जाएगी।
एक बार उनके सिर में दर्द होने लगा चिकित्सकों से सारी दवाइयां लेने के बावजूद भी उनका कोई उपचार नहीं हो पाया ।अनेक विद्वानों ने भी अपने अपने मतानुसार उनके ऊपर औषधीय परीक्षण किये।
देव नगर में ही एक अंकुर नाम का बालक रहता था वह भी पर पीड़ित की सेवा अपना धर्म समझता था।
उसे जब सेठजी के बारे में पता चला तो घर पर अपनी दादी से बात की।दादी ने एक दवाई बताई कि वह जंगल में मिलती है,एक पेड़ की जड़ है और जड़ को लाकर यदि दी जाए तो सिर दर्द ठीक हो सकता है।
अंकुर उसी दिन जंगल के लिए निकल गया बस उसे पेड़ के बारे में जो जानकारी दादी से मिली थी वही जानकारी थी ।
जंगल में गया तो उसे नदी के किनारे चीटियों का एक बड़ा सा बिल दिखाई दिया और उस तरफ नदी का पानी बहकर जा रहा था ।उसे देखकर लगा कि यदि यह पानी चीटियों के बिल की तरफ गया तो सारी चींटियां मर जाएगी । उसने पानी के उस बहाव को रोका और चींटियां मरने से बच गई ।
थोड़ा आगे चलने पर उसे जमीन पर बैठी गोरैया दिखाई दी और उसके ऊपर एक चील मंडरा रही थी ।फिर जैसे झपट्टा मारने के लिए नीचे की तरफ आई तो अंकुर ने उस गोरैया को बचा लिया । वह जंगल में चलता जा रहा था उसे वह ओषधि दिखाई नहीं दे रही थी । रात्रि में उसने जंगल में किसी पेड़ के ऊपर विश्राम किया।
उसे सपना आया जिसमें गौरैया बता रही थी कि थोड़ी दूर चलने पर एक बड़ का पेड़ है उस पेड़ के पास वह दवाई प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी।अब वह जमीन के नीचे दब गई है ।
उसने सुबह उसी बड़ के पेड़ का लक्ष्य कर अपनी यात्रा प्रारंभ की। थोड़ी दूर जाने पर उसे वह पेड़ दिखाई दिया उसने आसपास कोशिश की कि जमीन के नीचे से ओषधि निकाल सके,.... इधर-उधर तलाश करते हुए जमीन को खोदते हुए परेशान हो गया और थक हार कर बैठ गया।
इतने में उसने देखा कि हजारों चींटियों का झुंड उस पेड़ के चारों तरफ लगा हुआ है और थोड़ी ही देर में उन चींटियों ने एक जगह बड़ा सा गड्ढा कर दिया.... और चींटियां एक तरफ हो गई उसने खड्डे को थोड़ा बड़ा किया तो नीचे जैसी उसकी दादी ने ओषधि बताई थी ,वैसी ही ओषधि उसे मिल गई और वह लेकर सेठ के घर पहुंचा।
गौरैया हो या चींटी सब जानते हैं कि उपकार का बदला कैसे चुकाया जाता है। जब अवसर मिलता है तो उपकार के बदले प्रति उपकार किया जाता है यही गौरैया और चींटियों ने अंकुर के साथ किया और अंकुर ने उस सेठ की दानशीलता को देखकर उसके लिए किया, ... यही एक कड़ी है जो ऐसे सत कार्यों को आगे बढ़ाती है।आइए हम भी एक सत कार्य करें.....
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