पहचान

 बात तब की है,जब दुनियां में चीजें जैसी थींं, वैसी ही दिखती भी थीं। कुछ भी ढका हुआ, छिपा हुआ नहीं था। हर कुछ वैसा ही था जैसा बाहर था वैसे ही भीतर से भी!

उन्हीं दिनों की बात सुंदरता और कुरूपता दो बहनें थीं। ‘सुंदरता’ जितना दिखने में सुंदर थी, वैसे ही उसके कपड़े थे बेहद खूबसूरत। ‘कुरूपता’ भी जैसी थी वैसे ही कपड़े उसे पसंद थे।

एक दिन दोनों बहनें नदी में नहाने गईं। नहाने के बाद कुरूपता बाहर आई और सुंदरता के कपड़े पहनकर चली गई। कुछ देर बार सुंदरता बाहर आई, लेकिन उसके कपड़े पहनकर तो कुरूपता जा चुकी थी। अब वह क्या करे? बिना कपड़ों के तो जाना मुश्किल! अंत में उसने कुरूपता के कपड़े पहन लिए।

तब से ऐसा ही है। सजे-धजे सुंदर कपड़ों में कुरूपता घूमती है, और सुंदरता सुंदर होकर भी बदसूरत कपड़ों में रहती है।

पहले किसी को उन्हें पहचानने में मुश्किल नहीं आती। बाहर-भीतर का भेद नहीं था। लोग उन्हें उनके कपड़ों से पहचानते और ठीक पहचानते। अब धोखे में पड़ जाते हैं।

लेकिन, जिन्हें आदत थी चेहरा पढ़ने की, उन्हें सुंदरता और कुरूपता के चेहरे याद रहे। वे आज भी, उन्हें उनके असल चेहरे से पहचानते हैं, उनके आवरण से नहीं।

आइये,बाहरी आवरण के साथ साथ मन को टटोलें।

बाबा हनुमन्तलाल जी प्रार्थना है,व्यक्ति को पहचानने की शक्ति और सामर्थ्य हमें दें।

।।शिव।।

Comments

ईश्वर सबको सच्चाई और अच्छाई के रास्ते पर रखे।
जी,संपूर्णा आभार
गुणों की पहचान आन्तरिक है 🙏🏻🙏🏻

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