पका चावल
महेश बचपन से ही मेधावी छात्र था। उसने माध्यमिक और उच्च माध्यमिक की बोर्ड परीक्षा में मैरिट में स्थान बनाया था। उसकी इस सफलता के बावजूद उसके माता-पिता उसे खुश नहीं थे,क्योंकि पढाई को लेकर उसका घमंड और अपने बड़ों से तमीज से बात नहीं करता था। वह अक्सर ही लोगों से ऊंची आवाज़ मे बात करता और अकारण ही उनका मजाक उड़ा देता। खैर दिन बीतते गए और देखते-देखते महेश स्नातक भी हो गया।
स्नातक होने के बाद महेश नौकरी की खोज में निकला। प्रतियोगी परीक्षा पास करने के बावजूद उसका इंटरव्यू में चयन नहीं हो पाता था। महेश को लगा था कि अच्छे अंक के दम पर उसे आसानी से नौकरी मिल जायेगी पर ऐसा हो न सका| काफी प्रयास के बाद भी वो सफल ना हो सका| हर बार उसका घमंड, बात करने का तरीका इंटरव्यू लेने वाले को अखर जाता और वो उसे ना लेते| निरंतर मिल रही असफलता से महेश हताश हो चुका था , पर अभी भी उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे अपना व्यवहार बदलने की आवश्यता है।
एक दिन रास्ते में शोभित की मुलाकात अपने स्कूल समय के शिक्षक से हो गयी| वह उन्हें बहुत मानता था और वे भी उससे बहुत स्नेह करते थे।
महेश ने उनको सारी बात बताई । वे महेश के व्यवहार से परिचित थे, तो उन्होने कहा की कल तुम मेरे घर आना तब मैं तुम्हे इसका उपाय बताऊंगा।
महेश अगले दिन उनके घर गया,वे घर पर चावल पका रहे थे। दोनों आपस में बात ही कर रहे थे कि उन्होंने महेश से कहा-जाओ देख कर आओ कि चावल पके की नहीं।महेश अन्दर गया उसने अन्दर से ही कहा की सर चावल पक गए हैं, मैं गैस बंद कर देता हूँ। उन्होंने भी ऐसा ही करने को कहा।
अब महेश और उसके शिक्षक आमने सामने बैठे थे। वे महेश की तरफ मुस्कुराते हुए बोले –महेश तुमने कैसे पता लगया की चावल पक गए हैं?
महेश बोला ये तो बहुत आसान था।| मैंने चावल का एक दाना उठाया और उसे चेक किया कि वो पका है कि नहीं ,वो पक चुका था तो मतलब चावल पक चुके हैं।
अब शिक्षक समझाते हुए बोले - एक चावल के दाने ने पूरे चावल का हाल बयां कर दिया। सिर्फ एक चावल का दाना काफी है ये बताने को की अन्य चावल पके या नहीं। हो सकता है कुछ चावल न पके हों पर तुम उन्हें नहीं खोज सकते वो तो सिर्फ खाते वक्त ही अपना स्वाभाव बताएँगे।
इसी प्रकार मनुष्य कई गुणों से बना होता है, पढाई-लिखाई में अच्छा होना उन्ही गुणोँ में से एक है ,पर इसके आलावा, अच्छा व्यवहार, बड़ों के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति प्रेम , सकारात्मक दृष्टिकोण, ये भी मनुष्य के आवश्यक गुण हैं, और सिर्फ पढाई-लिखाई में अच्छा होना से कहीं ज्यादा ज़रुरी हैं।
तुमने अपना एक गुण तो पका लिया पर बाकियो की तऱफ ध्यान ही नहीं दिया। इसीलिए जब कोई इंटरव्यूर तुम्हारा इंटरव्यू लेता है तो तुम उसे कहीं से पके और कहीं से कच्चे लगते हो और अधपके चावलों की तरह ही कोई इस तरह के कैंडिडेट्स भी पसंद नही करता।
महेश को अपनी गलती का अहसास हो चुका था।वो अब अपने शिक्षक के यहाँ से नयी एनर्जी लेकर जा रहा था।
बाबा हनुमन्तलालजी से प्रार्थना है कि हमारे गुणों से बना चावल का एक-एक दाना अच्छी तरह से पका हो, ताकि कोई हमें कहीं से चखे उसे हमारे अन्दर पका हुआ दाना ही मिले।
।।शिव।।
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