सहेली

मीनाक्षी लाइब्रेरी के दरवाजे पर इस तरह खड़ी हो गई कि   जाह्नवी उसके अंदर नहीं आ पाए, जानबूझकर मीनाक्षी  ऐसे काम करती जिससे  जाह्नवी को हैरान होना पड़े।  जाह्नवी जानती थी कि मीनाक्षी से कुछ भी कहना बेकार है, इसलिए वो वापस पलट गई। पीछे जोरदार ठहाका लगा। जाह्नवी की आंखों मे नमी उतर आई।

कभी वे  दोनों पक्की सहेलियां हुआ करती थी। हर बात का साथ था दोनों का। पर आज केवल प्रतिद्वंद्वी। उनका दोस्ताना देख कितनी कोशिश चलती रहती कि इस दोस्ती मे दरार पड़ जाए। मालुम तो सबको ही था कि मीनाक्षी कान की कितनी कच्ची है,जाह्नवी ही उसे संभाल रखती।

"पहले कही बात को परखो फिर विश्वास करो" कितनी बार तो जाह्नवी ये बात मीनाक्षी के कानों मे डाल चुकी थी, उसे कहां पता था कि उसकी सीख ऐसे हवा मे उड़ जाएगी।



दोनों पढ़ाई के साथ लॉन्ग टेनिस मे भी माहिर थीं। इस बार खिलाड़ियों का चयन होना था स्टेट लेवल पर। शुरुआती प्रतियोगिता में ही दोनों आमने-सामने थीं। ये केवल इत्तेफाक था कि जाह्नवी का लगाया जोरदार शॉट, मीनाक्षी की उगलियों को चोटिल कर गया। इसी आधार पर उसे प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा। जाह्नवी का चयन हो गया।

वे लड़कियां, जो जाने कबसे इसी मौके की तलाश में थी, उनकी दोस्ती तोड़ने का सुनहरा मौका हाथ लगा। फिर जाने कितने अफसाने बने और जाह्नवी के प्रति मीनाक्षी का मन खट्टा कर गए। जाह्नवी की कोई सफाई काम न आई। मीनाक्षी की ये बेरूखी जाह्नवी को तोड़ गई

फिर वक्त ने कुछ ऐसी करवट ली कि वार्षिक परीक्षा के लगभग दो महीने पहले मीनाक्षी  बीमार पड़ गयी । उसे टाइफाइड ने आ घेरा। उसकी पढ़ाई ठप्प हो गई। वे चापलूस लड़कियां हवा के झोंके की मानिंद गायब होने लगी।

जाह्नवी ही रोज के नोट्स बना मीनाक्षी की मम्मी को दे आती। उसका लिखा पहचान न ले इसके लिए उसे अपने लिखे का तरीका बदलना पड़ा।

एक दिन मीनाक्षी की मम्मी ने ही बताया कि नोट्स मिलने के बाद भी वो उदास एवं हताश है। तब जाह्नवी ने उससे बात करने की सोची क्योंकि वो जानती थी पहल उसी को करनी पड़गी, वो नादान केवल मुंह फुलाना जानती है।

जाह्नवी को सामने देखते ही मानो मीनाक्षी का इतने दिनों का बांधा गुस्सा निकल पड़ा। वो और खरी सुनाती तभी उसकी मां आ गई।

 "बस कर जाह्नवी!! अपनी दोस्ती साबित करने के लिए और कितने इम्तिहान दोगी? ये नादान नहीं समझ पाएगी तुम्हारी दोस्ती को।"फिर मां ने मीनाक्षी के बीमार होने से लेकर अब तक का सारा किस्सा बयान किया।

 मीनाक्षी हैरान थी, शर्मिंदा भी। उसकी आंखों में आंसू छलक आए। जाह्नवी ने उसे गले लगा लिया। इतने दिनों का बिछोह दोनों की आंखों से आंसू बन बह निकले। आंटी की आंखे भी नम थी। एक महीने के बाद दोनों एक साथ स्कूल पहुंची। वे चापलूस लड़कियां आंख चुराते इधर-उधर हो गईं। उनकी दोस्ती अग्नि परीक्षा से गुजर और खरी हो गई थी।

बाबा हनुमन्तलालजी से प्रार्थना है,आप सबकी सच्ची दोस्ती सदा बनी रहें। 

हम सदा "पहले कही बात को परखो फिर विश्वास करो" के मंत्र का जीवन में पालन करें।

।।शिव।।

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शिव उवाच की कहानियो की श्रंखला में जाह्नवी की दोस्ती ने चार चांद लगा दिये 🙏🏻

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