नन्द के आनंद भयो...
प्रतीक्षा कीजिये, वो आएंगे ही....
मध्य भारत का गौरवशाली साम्राज्य हस्तिनापुर, एक समय का वैभव और शक्ति का प्रतीक, अब धीरे-धीरे षड्यंत्रों की भंवर में फंसता जा रहा था। सिंहासन पर विराजमान राजा अपनी बुद्धि को दूर गांधार की कुटिल चालों के हवाले कर अपने आपको निश्चिंत मान चुका था।
तो युग का वह महानतम योद्धा, जिसका नाम ही शत्रुओं के दिलों में खौफ पैदा करता था, अब असहाय-सा बंधन में जकड़ा हुआ था। उसके लिए स्वयं का स्व बड़ा था यही उसके लिए धर्म था और यही राष्ट्र धर्म।
एक अनैतिक प्रेम से जन्मा तूफान हस्तिनापुर को अधर्म के पंजों में जकड़ने को तैयार खड़ा था।
उधर, मथुरा में सत्तान्ध कंस अधर्म का परचम लहरा रहा था। उसने अपने पिता, बहन, बहनोई और पूरे कुटुंब को कैद की बेड़ियों में जकड़ लिया था। उसके जैसे ही शैतानी मानसिकता वाले ताकतें उसका साथ दे रही थीं, और धर्म को मानने वाले लोग लाचार थे, विवश थे और थे मौन ।
पूर्व में मगध की धरती पर जरासंध का राज था—एक ऐसा शासक, जिसका खुद का अस्तित्व भी दो गर्भों से जन्मे टुकड़ों को राक्षसी मंत्रों से जोड़कर बना था। उसकी ताकत, उसका बल, उसका रौब—कोई उसके आसपास भी नहीं ठहरता था।
ये सारी काली शक्तियां अकेली नहीं थीं। कंस और जरासंध का एक खतरनाक गठजोड़ था—कंस तो जरासंध का दामाद था! उनके पास विशाल सेनाएं थीं, समर्थकों की भीड़ थी, और कुछ लोग तो इनके कुकर्मों को भी सही ठहराते हुए इन्हें भगवान की तरह पूजते थे। दूसरी ओर, सच्चाई और धर्म में यकीन रखने वालों का अपमान हो रहा था।
उस युग में शासक भी थे और धार्मिक प्रवृति के भी थे पर कोई भी धार्मिक प्रवृति का शासक शक्तिशाली नहीं दिखता था। जो थोड़े-बहुत थे, उनकी ताकत क्षीण हो चुकी थी।
काले गठबंधन से एक ओर जन मन भयाक्रांत था तो दूसरी ओर गिद्ध दृष्टि जमाये बैठे थे देव भूमि से बाहर बैठे मलेच्छ।
ऋषि,तपस्वी,त्यागी, संत अपमानित हो रहे थे और हो रहा था आघात परंपराओं पर, धर्म की मान्यताओं पर। बेटियों को लूट रहा था। नरकासुर बेटियों को लूट रहा था, और उसे रोकने की ताकत जुटाकर लड़ने को कोई तैयार नहीं था ।
कोई दूध में जहर मिलाकर नव पीढ़ी को जमीन पर कदम रखने से पहले ही मारने पर उतारू था तो कोई बगुला सा बन लील जाना चाहता था भविष्य को,तो कोई जल को बनाकर जहरीला मृत्यु का तांडव करने को लालायित था, इन सबको सत्ता का संरक्षण प्राप्त था तो हर ओर इनका आतंक था।
सोचकर देखिये उस दौर में आम लोग कैसे जी रहे होंगे? क्या उनके दिल में कोई उम्मीद की किरण बाकी थी? अपने बच्चों का भविष्य उन्हें कैसा दिखता होगा? ऐसे अंधेरे वक्त में बेहतर कल की आस रखना कितना मुश्किल रहा होगा । शायद ज्यादातर लोग हार मान चुके होंगे।
लेकिन फिर भी, कुछ लोग थे—जो थे जिद्दी, अडिग। उन्हें था भरोसा कि वो कभी ना कभी तो अपनी देवभूमि पर आएंगे ही।
उन्हें था भरोसा बुरे दिन आएंगे, पर चले भी जाएंगे। अधर्म कितना भी बलवान हो, उसका अंत निश्चित है। मथुरा में कोई अक्रूर, हस्तिनापुर में कोई विदुर, कहीं कोई संदीपनि चुपके से, बिना शोर मचाए, अपना कर्म कर रहे थे। और उधर, बंदीगृह की ठंडी दीवारों के बीच, देवकी और वासुदेव अपने नवजात बच्चों की हत्या का दर्द सहते हुए भी कऱ रहे थे प्रतीक्षा उस आठवें की....
और फिर, वह पल आया! भादो की काली रात,मेघ गर्जना के साथ घनघोर बारिश से भारी अष्टमी की गहरी मध्यरात्रि। वासुदेव, अपने आठवें पुत्र को बचाने के लिए दौड़ पड़े।टोकरी में रखे बाल गोपाल पर बारिश से बचाने को अकेले सांप की छत्रछाया नहीं थी, बल्कि अक्रूर, विदुर और संदीपनी जैसे लोगों का अटल विश्वास भी था, जो उस अंधेरे में उम्मीद की लौ जला रहा था।
तो, विश्वास बनाए रखिए। वह हमेशा आता रहा है, और हमेशा आएगा। यह देश उसी का है। आपको बस इतना करना है— चुपचाप, अपना कर्म निभाते रहिये विदुर,अक्रूर और संदीपनि की तरह।जब वह आएगा तो वो सब कुछ आपको देगा, आपको मिलेगा जिसके आप हक़दार है।
( फोटो - श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रार्थना की, ध्यान रहे कृष्ण जन्मभूमि भी मुक्ति की प्रतीक्षा में है अयोध्या के श्री रामजन्मभूमि की तरह )
प्रतीक्षा, संकल्प और धर्म की जय हम सबने कुछ समय पूर्व ही देखी है अयोध्या में श्री राम लला की पुनः प्राण प्रतिष्ठा के रूप में।
भरोसा रखिये, प्रतीक्षा कीजिये, नंदी सा धैर्य रखिये, यही तो मूल मंत्र है सदियों से मनाये जा रहे श्री कृष्ण जन्माष्टमी के महापर्व का। प्रतीक्षारत समाज का उत्सव,संकल्पबद्ध समाज का महोत्सव।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर आपको अनंत शुभकामनायें.
।। शिव।।
Comments
सम्पूर्ण जगत के आधार लीलाधर, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जी के पावन अवतरण दिवस 'श्रीकृष्ण जन्माष्टमी' की सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगलमय शुभकामनाएं!
मुरलीधर सभी के जीवन में प्रेम, करुणा एवं भक्ति का संचार कर चराचर जगत का कल्याण करें, यही प्रार्थना है।
जय श्रीकृष्ण!
बहुत बढ़िया लिखा शिवजी।
पढने ऊर्जा का संचार हुआ
साधुवाद
रिंकू शर्मा
कृष्ण जन्माष्टमी को दुष्टता पर धर्म की जीत के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में मनाते हैं। राजा कंस के अत्याचारी शासन के तहत जेल की कोठरी में भगवान कृष्ण का जन्म दुष्ट शक्तियों को मिटाने के लिए एक दिव्य मिशन की शुरुआत का प्रतीक है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि चाहे बुराई कितनी भी भयानक क्यों न हो, अंततः अच्छाई की जीत होगी। कृष्ण का जीवन अच्छाई और बुराई के बीच शाश्वत संघर्ष का उदाहरण है, जो हमें अपने मूल्यों पर दृढ़ रहने और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करता है।
गोविंद देव जी आपको उत्तरोत्तर प्रगति प्रदान करें
*कृष्ण जन्माष्टमी की आपको और आपके परिवार को ढेरी सारी बधाईयां*🪈🪈
🙏 केशव राठी 🙏