संतोष ही सुख है.....

संतोष धन

सज्जनपुर में एक गरीब आदमी रहता था। बहुत मेहनत करने के बाद भी वह निर्धन ही रहता,कई बार तो उसे भूखे ही रात गुजारनी पड़ती। इस मुसीबत से छुटकारा पाने का कोई उपाय उसे न सूझता। एक दिन उसे एक महात्मा जी मिल गए। उसकी सेवा से प्रसन्न हो उन्होंने उसे भगवान की आराधना का एक मंत्र दिया। 

उसने उस मंत्र से भगवान की साधना करने लगा और काम भी उसी लगन से करता रहा। 

एक दिन देव उसके सामने प्रकट हुये। देव ने उससे कहा, ”मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूं। बोलो क्या चाहते हो? निर्भय होकर मांगो।“

एकाएक देव को सामने देखकर वह घबरा गया। क्या मांगा जाए, यह वह तुरंत तय ही न कर सका, इसलिए हड़बड़ाहट में बोला, ”देव, इस समय तो नहीं, हां मैं कल आपसे मांग लूंगा।“

घर जाकर वह व्यक्ति सोच में पड़ गया कि क्या मांगा जाए? उसके मन में आया कि रहने के लिए घर नहीं है, इसलिए वही मांगा जाए। घर भी कैसा मांगा जाए, वह उस पर विचार करने लगा। ये सेठजी का मकान सबसे बड़ा है वैसा मांग लूँ,तो मैं भी सेठ हो जाऊं, तो अच्छा रहे। यह विचार कर उसने सेठजी जैसा व्यापार मांगने का निर्णय कर लिया।

इस विचार के आने के बाद वह सोचने लगा कि कई बार सेठजी अफसर के सामने  मिन्नतें करते हैं। इस प्रकार इन सेठजी से बड़ा तो अफसर ही है, इसलिए जब बनना ही है तो अफसर क्यों न बन जाऊं?

इस प्रकार विचार कर वह अफसर बनने की इच्छा करने लगा। अब वह इस निर्णय से खुश था। लेकिन, उसके मन में विचार समाप्त नहीं हुए और कुछ देर बाद उसे मंत्री का ध्यान हो आया। वह जानता था कि मंत्री जी के सामने अफसर भी कुछ नहीं है। वो तो भीगी बिल्ली सा बना रहता है, मंत्री के सामने। इस तरह उसे अब अफसर का पद भी फीका लगने लगा था। अतः इच्छाएं बढ़ती चली गईं। वह सोचने विचारने में ही इतना फंस गया कि कुछ तय नहीं कर पाया कि क्या मांगा जाए। इस तरह तो दिन बीता ही, रात भी बीत गई।

दूसरे दिन सवेरा हुआ। वह अभी भी कुछ निर्णय नहीं कर पाया था। ज्यों ही सूरज की पहली किरण पृथ्वी पर पड़ी देव उसके सामने प्रकट हो गये। उन्होंने पूछा, ”बोलो, अब क्या चाहते हो? अब तो तुमने सोच विचार कर निश्चय कर लिया होगा कि क्या मांगना है?“

उसने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, ”हे देव, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो सिर्फ भगवान की भक्ति और आत्म संतोष का गुण दीजिए। यही मेरे लिए पर्याप्त है।“ देव ने पूछा, ”क्यों भई, तुमने धन दौलत क्यों नहीं मांगी?

वह विनम्रता से बोला, ”देव, मेरे पास दौलत नहीं आई। बस आने की आशा मात्र हुई तो मुझे उसकी चिंता से रात भर नींद नहीं आई। यदि वास्तव में मुझे दौलत मिल जाएगी, तो फिर नींद तो एकदम विदा ही हो जाएगी। इसलिए मैं जैसा हूं, वैसा ही रहना चाहता हूं। आत्म संतोष का गुण ही सबसे बड़ी दौलत होती है। आप मुझे यही दीजिए। साथ ही यह संसार सागर पार करने के लिए भगवान नाम के स्मरण का गुण दीजिए।“

देव ने उसे आशीर्वाद दे दिया। अब उसका घर सब सुविधाओं से युक्त था और भगवान नाम संकीर्तन की मधुर ध्वनि सदा गूंजती, उसकी मेहनत का फल बहुगुणा होकर मिलने लगा।वह व्यक्ति संतोषी भाव के साथ प्रसन्नता से अपना जीवन बिताने लगा।



जीवन में पद, प्रतिष्ठा, पैसे की अंधी दौड़ से लाख गुणा ठीक है आत्म संतोषी होना, केवल आरती में मत गाइये तेरा तुझको अर्पण,एक बार इस भाव को मन में जगाकर देखिए...

बाबा तुलसीदास जी ने जैसे कहा है श्री हनुमान चालीसा में अपने हनुमन्तलालजी से...नासै रोग हरे सब पीरा...इसी भाव के साथ आज के दिन मंगलकामना।

।।शिव।।

Comments

dilip said…
शानदार मायने है।
धन्यवाद भाईसाब, आपकी कहानियाँ बहुत ही प्रेरणास्पद होती है, साथ ही मेरी एक समस्या भी हल हो गई बच्चों के लिए प्रतिदिन एक कहानी मिल जाती है।
बहुत शानदार हक़ीक़त
प्रेरणा दायक कहानी हम इसे शेयर करके आगे बढ़ाएंगे 👍

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