अन्न का अनादर भुखमरी को निमंत्रण?
भोजन की बर्बादी: शास्त्रों और धरती माता का अपमान
देश के बड़े बड़े शहर, कस्बे के उन हजारों मध्यवर्गीय अपार्टमेंट्स में, जहां परिवार कर्ज के बोझ तले कराह रहे हैं, हर सुबह एक दर्दनाक दृश्य दोहराता है। मुख्य द्वार के बाहर, सीवर के मेन होल के ढक्कन पर पड़ी पूरियां, रोटी के टुकड़े, चावल और बची हुई सब्जी का ढेर। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि रोज का नियम बन चुका दृश्य है। एक ओर जहां ये परिवार कार की किश्त, मकान का किराया या उसकी इएमआई,बच्चों की स्कूल फीस और महंगाई से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी थालियों से निकला अन्न नाली में समा रहा है। यह दृश्य न सिर्फ दिल दहला देता है, बल्कि सवाल उठाता है — क्या हमारी संवेदनाएं फ्रिज की तरह ठंडी हो गई हैं?
यह भोजन की बर्बादी केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि धरती माता की कोख से उपजे अन्न,किसान के पसीने, प्रकृति के संसाधनों और अपने शास्त्रों का सीधा अपमान है। भारतीय शास्त्र अन्न को देवता मानते हैं।
शास्त्रों की सीख समझें
तैत्तिरीय उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है — “अन्नं वै प्राणः”, अर्थात् अन्न ही प्राण है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं — “अन्नाद् भवन्ति भूतानि”, यानी सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। ईशावास्योपनिषद् की शिक्षा “तेन त्यक्तेन भुंजीथा” (त्याग के साथ भोग करो) हमें सिखाती है कि अन्न को बर्बाद करना प्राण तत्व का गला घोंटना है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा भी बचे हुए भोजन को प्रजा में बांट देते थे, लेकिन आज मध्यवर्गीय जीवनशैली में ‘अन्न देवता’ का मजाक उड़ाया जा रहा है।
शहरों का यथार्थ: मध्यवर्ग की विडंबना
आजकल के शहरी अपार्टमेंट्स में फ्रिज भरा रहता है, लेकिन प्लेट की मर्यादा भूल गई है। रेस्तरां में ‘फ्रोजन फूड’ पर भारी रकम खर्च करने वाले लोग घर की रोटी, जो मां या पत्नी ने प्यार से सेंकी, उसे बिना सोचे फेंक देते हैं। यह बर्बादी सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि भावनाओं और मेहनत की भी है। किसान खेत में पसीना बहाता है, पानी और उर्वरक खर्च करता है, फिर फसल बाजार तक पहुंचती है,लेकिन शहरों में एक छोटी-सी लापरवाही उसे कूड़े में बदल देती है।
आंकड़ों की भाषा में सच्चाई
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की Food Waste Index Report 2024 के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत के घरों में 78.2 मिलियन टन (लगभग 7.82 करोड़ टन) भोजन बर्बाद हुआ। यह प्रति व्यक्ति 55 किलो सालाना है, जबकि वैश्विक औसत 79 किलो है। घरेलू स्तर पर विश्व का 60% भोजन अपशिष्ट घरों से ही आता है। दैनिक आधार पर यह आंकड़ा करीब 2.14 लाख टन प्रतिदिन बैठता है। आर्थिक नुकसान की बात करें तो यह 92,000 करोड़ रुपये से अधिक का है — कुछ अनुमानों में यह राशि 1 लाख करोड़ से भी ऊपर पहुंच जाती है।
वैश्विक स्तर पर 2022 में कुल 1.05 बिलियन टन भोजन बर्बाद हुआ, जिसमें से घरों का हिस्सा सबसे बड़ा (631 मिलियन टन) है। भारत इस मामले में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।
यह बर्बादी पर्यावरण के लिए भी अभिशाप है। भोजन अपशिष्ट लैंडफिल में सड़ने पर मीथेन गैस छोड़ता है, जो ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देता है। UNEP के अनुसार, भोजन की हानि और बर्बादी वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 8-10% हिस्सा है — जो विमानन क्षेत्र के कुल उत्सर्जन से लगभग पांच गुना ज्यादा है।
भूमि और किसानों पर दोहरा बोझ
भूमि पहले ही अत्यधिक रसायनों के प्रयोग, बदलते मौसम के कारण अपनी उर्वरा शक्ति खोती जा रही है, वहीं किसान जलवायु परिवर्तन, महंगे बीज-खाद और मूल्य की अनिश्चितता से जूझ रहा है। फसल उत्पादन के बाद कोल्ड स्टोरेज की कमी, खराब परिवहन और बाजार पहुंच की समस्या के कारण 30-40% तक उपज का नुकसान हो जाता है फिर शहरों में उपभोक्ता स्तर पर बर्बादी होती है।
नतीजा? धरती की कम होती उर्वरा क्षमता पर फिर रसायनों की मार और किसान की मेहनत व्यर्थ, जबकि लाखों लोग भूखे सोते हैं। भारत में करीब 19 करोड़ लोग कुपोषण या भोजन असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।
छोटे बदलाव, बड़ा असर
भोजन बर्बादी रोकना कोई बड़ी क्रांति नहीं, बल्कि छोटी आदतों का परिवर्तन है:
भोजन योजना बनाएं: सप्ताह का मेन्यू पहले से तय करें, सिर्फ जरूरत के अनुसार खरीदारी करें।
बचे हुए खाने का सदुपयोग: रोटी से उपमा, चावल से फ्राइड राइस, सब्जी से पराठा या सूप बनाएं। कई परिवार अब ‘ज़ीरो वेस्ट’ रेसिपी शेयर कर रहे हैं।
दूसरों तक पहुंचाएं: यदि ज्यादा बच गया है तो पड़ोसियों, गरीब परिवारों या एन जी ओ के जरिए बांटें। एफ एस एस ए आई की ‘Save Food Share Food’ पहल इसी दिशा में काम कर रही है।
जागरूकता: स्कूलों में बच्चों को अन्न की कीमत सिखाएं। शास्त्रों की शिक्षाओं को घर-घर पहुंचाएं।
समुदाय स्तर पर: सोसायटी में ‘अन्न बचाओ’ अभियान चलाएं — बचे भोजन को कंपोस्ट बनाकर बागान में इस्तेमाल करें या बायोगैस प्लांट में भेजें।
रोटी में अब तक पहचाने जाने वाले किरदारों में एक रोटी बनाता है, दूसरा खाता है और सुदामा पांडे ‘धूमिल’ ने अपनी कविता में ‘तीसरा आदमी’ का जिक्र है — जो न रोटी बेलता है, न खाता है, सिर्फ खेलता है। आज वह तीसरा आदमी मध्यवर्गीय नागरिक बन चुका है। लेकिन हम चौथा आदमी बन सकते हैं — जो बचे हुए अन्न को नया जीवन देता है और अन्न देवी को मुस्कुराता देखता है।
अगली बार जब थाली में कुछ बच जाए, तो एक पल रुककर सोचिए — यह निवाला किसी किसान की मेहनत, किसी भूखे की उम्मीद और हमारे शास्त्रों की शिक्षा है। अन्न को सहेजना सिर्फ आदत नहीं, संस्कार है। यदि आप भी बचे खाने से नई रेसिपी बनाते हैं या कोई पहल कर रहे हैं, तो अपने मित्रों, परिजनों से साझा करें। शायद एक छोटी कहानी कई बंद दिमाग खोल दे।
अन्न दान महादान है — अन्न बर्बादी महापाप।
चलिए, आज से ही बदलाव शुरू करें। क्योंकि जिस दिन अन्न रूठ जाएगा, उस दिन न कार की चमक, न फ्लैट की चकाचौंध भूख मिटा पाएगी।
शिव शंकर शर्मा
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