बंगाल में ममता की हार - सनातन की जय जयकार



पांच विधानसभा चुनाव के परिणाम बहुत कुछ कहते हैं इन परिणामों के मायने बहुत कुछ है पर  पश्चिम बंगाल के परिणाम भविष्य की इबारत लिखते हुए दिख रहे है।

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम देशभर की आशा के अनुकूल रहे हैं परंतु जो बंगाल की राजनीतिक स्थिति समझते रहे हैं उनके लिए यह चुनौती पूर्ण था कि भारतीय जनता पार्टी यहां कमल का फूल कैसे खिला सकती है।

 बंगाल में अब तक तीन दलों का शासन रहा है और वह भी लंबे समय तक। पहले कांग्रेस राज करती थी फिर वामपंथी आ गए और उसके बाद ममता बनर्जी आ गई। ये आए कैसे एक दूसरे को हराकर इसे समझें बिना आज के परिणाम का मूल नहीं समझ सकते।

बंगाल में कांग्रेस की सत्ता थी, जब इंदिरा गांधी को वैचारिक खाद पानी की जरुरत हुई तो उसे वामपंथ का साथ मिला, भले ही वो आज की तरह वामपंथ के मकड़जाल में उलझी नेता नहीं दिखाई देती थी, पर सत्ता के प्रतिष्ठानों पर उनकी नियुक्ति, सत्ता की चाशनी में हिस्सेदारी देने की अबोली शर्तों ने ही कांग्रेस को वैचारिक साधन दिए जो नेहरू के देहावसान के बाद विचार शून्य हो गई थी।

कांग्रेस की बंगाल से विदाई उसी समझौते का हिस्सा थी, यही कारण है कि किसी दबंग नेता को कांग्रेस आलाकमान ने स्वीकार ही नहीं किया और कांग्रेस के बाद वर्षों तक वाम मोर्चा की सरकार बंगाल में बनती गई, ममता बनर्जी इसी से गुस्सा थी और बगावत कर बैठी।

यह वह दौर था जब भाजपा भारत में अपने भविष्य की रणनीति बना रही थी, संघ वैचारिक रूप से वाम के खिलाफ है, उसी वाम को उखाड़ फेंकने के लिए अटल जी भाजपा के भविष्य के लिए कटहल लगाने का निश्चय किया जैसा उन्होने तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में भी किया।

कुछ समझें कटहल लगाने की रणनीति?

कटहल लगता देरी से है पर बाद में बरसो फल देता है, मौसमी फसल की तरह नहीं की एक बार में ही खत्म हो जाए।

अटलजी और संघ ने रणनीति से नखरे झेलते हुए भी माया, ममता और जयललिता का साथ दिया, आज उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने को तैयार है, बंगाल में वाम से ममता को सत्ता हस्तान्तरण और अब उससे भाजपा ने ले लिया, तमिलनाडु में अपने ही प्रदेश अध्यक्ष को बदलना पर याद रखियेगा टीवीके से सत्ता भाजपा के पास ही आएगी और केरलम में भी अगले एक दो चुनाव में भाजपा का कमल खिलेगा ही।

खैर फिर लौटते है बंगाल की ओर, पिछली बार चुनाव में माहौल था, रणनीति भी थी पर संगठन की रचना धरातल पर मजबूत नहीं थी, जहाँ कमजोर थी उसका तोड़ कैलाश विजयवर्गीय ने टी एम सी से ही नेताओं को तोडना शुरू किया तो हव्वा हवाई में भीड़ भरते गए जो बाद में ममता की सरकार बनते ही भाग भी गए पर दलबदल से वहाँ धरातल पर टी एम सी के गुंडों से लड़ने वाला कार्यकर्त्ता ही नाराज हो गया, कैसे उनको अपना नेता मानता जो उनकी हत्या करने के लिए तैयार है उनके परिवार की बहन बेटियों पर गलत नजर रखता है ऐसे में भाजपा के कार्यकर्ताओं के पास एक ही विकल्प था केवल अपना वोट देना।

 उन परिणाम का विश्लेषण करेंगे तो पता चलेगा कि भारतीय जनता पार्टी के मूल कार्यकर्ता को टिकट दी वहां भारतीय जनता  की जीत दर ज्यादा थी।

बदली रणनीति 

 इस बार के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने एक खास रणनीति पर ध्यान दिया इस बार कोई बड़बोले नेता प्रभारी बनकर नहीं गए इस बार भेजे गए संगठन प्रभारी के रूप में सुनील बंसल को संगठन का लंबा अनुभव रहा है विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से आए बंसल उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाने में महती भूमिका के लिए जाने जाते है, उन्होंने ही बूथ  और युथ का ऐसा चक्कर व्यूह रचा की सत्ता बदलने की घोषणा करने वाले गच्चा खा गए और  दूसरी बार लगातार भाजपा की सरकार बन गई

संघठन कौशल के महारथी पर मीडिया और परदे पर आने की बजाय परदे के पीछे और अपनों के बीच में रहकर रणनीति बनाने में सिद्ध हस्त है।

 सुनील बंसल ने जहां संगठन तंत्र को मजबूत करने के लिए धरातल पर काम किया कार्यकर्ताओं को बदलाव के लिए तैयार किया, कार्यकर्ताओं का जोश जुनून इतना ऊंचा था कि वह एक साल से अपने बूथ को मजबूत करने में जुटे हुए थे।प्रवासी कार्यकर्ताओ की उनकी क्षमता के अनुसार काम देना, तय योजना की निगरानी करना उनकी विशिष्ट शैली है।

उनका कार्यकर्ताओ को उनके नाम से पुकारना कार्यकर्त्ता को उनसे कनेक्ट कर देता है और वो कनेक्शन संगठन के उद्देश्य पूर्ति में बहुत मदद करता है।

अमित शाह की टीम के मजबूत स्तम्भ बंसल के साथ जोड़ा गया केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को, वे भी मीडिया से उचित दूरी और कम बोलने के लिए जाने जाते है।

राजस्थान और बंगाल का सिद्ध कनेक्शन 

 बरसों से राजस्थानियों के लिए पश्चिम बंगाल अपनी कर्मभूमि रहा है और भाग्यशाली भी। 

राजस्थान से लोटा डोरी लेकर गए लोगों ने इतिहास रचा है और वे वहाँ की परम्परा में रसगुल्ला के रस की तरह घुले मिले है।

 बंगाली समुदाय के लिए भी राजस्थानी भाग्यशाली रहे है स्वामी विवेकानंद का जब से खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह से जुड़ाव हुआ तभी से पर नरेंद्र से विवेकानंद बने और आज जो वस्त्र पहने हुए उनकी जो छवि है वह पहचान राजस्थान ने ही दी है।

इसी तरह जब भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई उसके संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल से थे और उनके पहले महामंत्री और बाद में जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी ) को वैचारिक आधार देने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म भी राजस्थान के धानकिया गांव में हुआ था।

 जेष्ठ माह को हिन्दू मान्यता में पवित्र मानते है उसके पहले बड़े मंगलवार की पूर्व संध्या पर सनातन की जय का नाद कर गया और इस जयनाद में शक्ति की भूमि कोलकाता से मिला शक्ति का आशीर्वाद एक विशेष संदेश है अब सनातन की अनदेखी महंगी पड़ेगी, अब मौन नहीं मुखर हो गया है समाज बस अवसर का इंतज़ार करता है।


आप बस कटहल उगाते रहिये अटलजी की तरह, मोदी जी की तरह माली बनकर निर्देशन संभाल ले तो अमित शाह के साथ लगे सुनील बंसल जैसे लोगों को खरपतवार खत्म करने और मित्र कीड़ो को पहचानने की महारत हासिल है, वे सनातन की जय का मार्ग प्रशस्त करते जाएंगे।

बड़ा मंगल सनातन के मंगल का जय घोष कर गया और सुनील बंसल जैसे सांगठनिक योद्धाओं के लिए तो यह विशेष ही बन गया क्योंकि उनके आराध्य हनुमान जी का आशीर्वाद मिल गया।

असम में फिर से तीसरी बार भाजपा की सरकार बन रही है, मुख्यमंत्री की पत्नी के अलग अलग देशो के पासपोर्ट रखने का पवन खेड़ा वाला कार्ड भी काम नहीं आया,उलटे उन्हें कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और अब वे भी राहुल गांधी, सोनिया गाँधी की तरह ज़मानत पर है, असम पुर्वोत्तर के सेवन सिस्टर प्रदेशों में बड़ी भागीदारी रखता है, इसलिए यहाँ का सन्देश ऊपरी हिस्सों तक जाता ही है।

असम बांग्लादेशी, रोहिंग्या घुसपैठियों को लेकर लम्बे समय से दुःखी है, स्थानीय समाज पर बढ़ता दबाव और कांग्रेस की सरकारों में घुसपैठियों का प्रभाव असामिया समाज नहीं भूल सकता।यही कारण है कि मुख्यमंत्री हिमंता विश्वा सरमा मियाँ मुक्त असम विजन के साथ स्वीकार्य हो गए।

पुदुचेरी के परिणाम भी आशा के अनुसार रहे, छोटा सा केंद्र शासित प्रदेश पर यहाँ भी कमल का कमाल देखने को मिला।

अब आते है उस तमिलनाडु की ओर जहाँ के मुख्यमंत्री सनातन को कीड़ा बताते हुए गाल बजा रहे थे, द्रविड़ आंदोलन के नाम पर सनातन परम्परा को बरसो से कुचलना वहाँ की राजनैतिक परम्परा बन गई, भाजपा के पास ज्यादा अवसर नहीं रहे क्योंकि इसके पूर्व अध्यक्ष ने जो सिंघम स्टाइल में काम शुरू किया था वह बीजेपी में अटल जी की शुरू की गई उस विशेष रणनीति से मेल नहीं खाती थी, इसलिए रणनीतिक तौर पर दो कदम पीछे खींचना ही सही लगा, बड़ा लक्ष्य था सनातन द्रोहियों को सत्ता से बेदखल करना परिणाम साफ है नॉन द्रविड़ आंदोलन वाली दो साल पुरानी पार्टी टीवीके बड़े दल के रूप में उभरी है।

सनातन द्रोहियों को सत्ता से बाहर करने का स्पष्ट जनादेश तमिलनाडु के मतदाताओं ने सुना दिया, यह संघ भाजपा की उस वैचारिक रणनीति के अनुकूल है और नये दल के लिए स्पष्ट सन्देश।

 केरलम से भी जो नतीजे आए है वो उस बदलाव की मांग के अनुकूल ही है, वाम की विदाई पिछले 50 साल से देश के किसी ना किसी हिस्से पर सत्ता में रहने वाले वामपंथ को आज जनता ने रथी से अ-रथी कर दिया है।

 हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने देश को नक्सलवादी माओवाद से मुक्त होने की घोषणा की थी, अब जनता ने सत्ता से भी माओवाद को विदाई दे दी है।

 वामपंथी अब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नारे लगाते हुए या कांग्रेस को भारत और सनातन के विरुद्ध सलाह देते हुए देखे जा सकते हैं।

अंग और कलिंग जय के बाद बंग की जय पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ठीक ही कहा है कि भारतीय जनता पार्टी का भगवा ध्वज अब गंगोत्री से गंगासागर तक गर्व के साथ फहरा रहा है।

पांचो प्रदेशों के नागरिकों के ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत और उनके लिए शुभकामनायें, कि उनके लिए जैसे कल बड़ा मंगल का दिन है वैसे ही उनकी सुरक्षा, समृद्धि और कल्याण के लिए हर दिन मंगलमय हो।

।। शिव।।

 

Comments

Anonymous said…
बड़े मंगल का बड़ा उपहार 🎁
सनातन की जय जयकार 🙏
Anonymous said…
आज ऐतिहासिक दिन है मां भारती के लोकतंत्र के लिय असली लोकतंत्र की जीत प बंगाल के इंसान वोटर्स ने उन नेताओं को गलत साबित कर दिया जो कहते है भारत का लोकतंत्र खतरे मे है जय बंगला, "एक भारत श्रेष्ठ भारत "

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