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बंगाल में ममता की हार - सनातन की जय जयकार

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पांच विधानसभा चुनाव के परिणाम बहुत कुछ कहते हैं इन परिणामों के मायने बहुत कुछ है पर  पश्चिम बंगाल के परिणाम भविष्य की इबारत लिखते हुए दिख रहे है। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम देशभर की आशा के अनुकूल रहे हैं परंतु जो बंगाल की राजनीतिक स्थिति समझते रहे हैं उनके लिए यह चुनौती पूर्ण था कि भारतीय जनता पार्टी यहां कमल का फूल कैसे खिला सकती है।  बंगाल में अब तक तीन दलों का शासन रहा है और वह भी लंबे समय तक। पहले कांग्रेस राज करती थी फिर वामपंथी आ गए और उसके बाद ममता बनर्जी आ गई। ये आए कैसे एक दूसरे को हराकर इसे समझें बिना आज के परिणाम का मूल नहीं समझ सकते। बंगाल में कांग्रेस की सत्ता थी, जब इंदिरा गांधी को वैचारिक खाद पानी की जरुरत हुई तो उसे वामपंथ का साथ मिला, भले ही वो आज की तरह वामपंथ के मकड़जाल में उलझी नेता नहीं दिखाई देती थी, पर  सत्ता के प्रतिष्ठानों पर उनकी नियुक्ति, सत्ता की चाशनी में हिस्सेदारी देने की अबोली शर्तों ने ही कांग्रेस को वैचारिक साधन दिए जो नेहरू के देहावसान के बाद विचार शून्य हो गई थी। कांग्रेस की बंगाल से विदाई उसी समझौते का हिस्सा थी, यही कारण है कि किसी द...

चंद्र शेखर जी - संभावनाओं से भरे संगठन शिल्पी

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भाजपा में संगठन महामंत्री एक विशिष्ट दायित्व है, जिसका निर्वहन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आए प्रचारक करते रहे है, राजस्थान में भी दो साल पहले तक ऐसे ही प्रचारक जो उत्तर प्रदेश से आए थे लगभग सात साल रहे, अब वे तेलंगाना में ऐसी ही जिम्मेदारी निभा रहे है। मैं बात कर रहा हूँ श्री चंद्र शेखर जी की, जिनका आज जन्मदिन भी है। उन्होंने राजस्थान में ऐसे समय में काम संभाला जब बरसो से प्रदेश में कोई संगठन मंत्री नहीं थे, संगठन सत्ता केंद्रित हो गया था। राजनीति की यह विडंबना ही है कि संगठन सत्ता केंद्रीत होता जाता है अगर उसे संगठन तंत्र का कोई सिद्ध हस्त नहीं संभाले, इसीलिए भाजपा के नीति निर्माताओं ने इसे समझा और संगठन कोई विचार केंद्रित रखने के संगठन मंत्री जैसे दायित्व की रचना की।  चंद्रशेखर जी ने उत्तर प्रदेश से यहां आकर थोड़े ही समय में कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कर अपनी अलग पहचान बना जहां कार्यकर्ता अपने मन की बात कह सकता। लोक संग्रही और विचार के आग्रही के रूप में कार्यकर्ताओं ने संगठन में अपने अभिभावक के रूप में स्वीकार किया।  उन्होंने संगठन शास्त्र के एक मंत्र पर कार्यकर्ता के लिए का...

अन्न का अनादर भुखमरी को निमंत्रण?

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  भोजन की बर्बादी: शास्त्रों और धरती माता का अपमान  देश के बड़े बड़े शहर, कस्बे के उन हजारों मध्यवर्गीय अपार्टमेंट्स में, जहां परिवार कर्ज के बोझ तले कराह रहे हैं, हर सुबह एक दर्दनाक दृश्य दोहराता है। मुख्य द्वार के बाहर, सीवर के मेन होल के ढक्कन पर पड़ी पूरियां, रोटी के टुकड़े, चावल और बची हुई सब्जी का ढेर। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि रोज का नियम बन चुका दृश्य है। एक ओर जहां ये परिवार कार की किश्त, मकान का किराया या उसकी इएमआई,बच्चों की स्कूल फीस और महंगाई से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी थालियों से निकला अन्न नाली में समा रहा है। यह दृश्य न सिर्फ दिल दहला देता है, बल्कि सवाल उठाता है — क्या हमारी संवेदनाएं फ्रिज की तरह ठंडी हो गई हैं? यह भोजन की बर्बादी केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि धरती माता की कोख से उपजे अन्न,किसान के पसीने, प्रकृति के संसाधनों और अपने शास्त्रों का सीधा अपमान है। भारतीय शास्त्र अन्न को देवता मानते हैं।  शास्त्रों की सीख समझें  तैत्तिरीय उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है — “अन्नं वै प्राणः”, अर्थात् अन्न ही प्राण है । भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कह...

शिव सदा सहाय, सबको लुभाए

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शिव भारत के महा देव हैं। इस अर्थ में महादेव हैं कि बसते हैं कैलाश में, पर रमते हैं समूचे भारतवर्ष में। जंगलों में, नदियों के किनारे, समुद्र के बीच में और पहाड़ों की चोटियों पर अपना डेरा जमा लेते हैं। तभी तो वे जन मन के देव है, पुत्र पिता रूप में देखते है और नव युवतियाँ के लिए पति रूप में शिव सा ही वर मिले इसकी कामना है, युवक की आराधना में स्वयं को सामर्थ्यशाली बनाने के लिए शिव गौरी जैसी जीवन संगिनी की प्रार्थना। आशुतोष शिव , भारतीय मन को सहज ही लुभाते हैं। ऐसे देवता से जुड़कर हर एक मन महीप बना रहता है। कभी अनुभव नहीं करता कि वह कहीं से हीन है। हाथ में भिक्षा-पात्र, पर औघड़दानी ऐसे कि कोई खाली हाथ लौटा नहीं, मनमाना लेकर गया। महाशिवरात्रि का पर्व आदि देव महादेव को याद करते हुए स्वयं सदाशिव हो जाने का दिन है। अनोखे-अद्भुत औघड़दानी जरूरी नहीं कि वे मंदिर है वहीं मिलेंगे कभी वे पेड़ के नीचे आराम करते मिल जाएंगे। कभी नदी के बीच पत्थरों के साथ केलि करते मिल जाएंगे। कभी घर-आंगन में छोटी-सी कांसे की थाली में कुछ क्षणों के लिए विराज जाएंगे और कभी केवल बमभोला के बोल में। कभी गीत में, कभी नृत्य मे...

वीबी जी रामजी - ग्रामीण भारत के सपनों को नई उड़ान

  भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करोड़ों परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरा है विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025। राष्ट्रपति ने दिसंबर 2025 में इस कानून को मंजूरी दी, और अब यह देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा का नया, मजबूत और आधुनिक रूप बन चुका है। इस नए कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब हर पात्र ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन का वैधानिक रोजगार गारंटी मिलेगी—पहले यह 100 दिन था। यानी 25 दिन का अतिरिक्त रोजगार, जो लाखों-लाख परिवारों के लिए अतिरिक्त कमाई, बेहतर खाना, बच्चों की पढ़ाई और छोटे-मोटे सपनों को पूरा करने का जरिया बनेगा। लेकिन यह सिर्फ दिनों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है। कानून का असली मकसद है ग्रामीण भारत को मजबूत, आत्मनिर्भर और उत्पादक बनाना—जहाँ रोजगार सिर्फ मजदूरी न हो, बल्कि स्थायी आजीविका का आधार बने। कानून लागू होते ही कुछ लोगों ने इसे लेकर गलतफहमियाँ फैलाईं। कुछ ने कहा कि रोजगार गारंटी कमजोर हो गई है, कुछ ने केंद्रीकरण का रोना रोया, तो कुछ ने इसे बजट कटौती का बहाना बताया। लेकिन हकीकत इन दावों से ...

नवरात्र विचार -3 कैसे हो सलाहकार?

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 नवरात्र विचार में आज बात करते हैं कि हमारे सलाहकार कैसे हो और हम सलाहकार कैसे हो ?  जब सुंदरकांड का हम पाठ करते हैं तब उसमें विभीषणजी रावण को समझाते हैं उस समय रावण की सभा में जो प्रतिक्रिया होती है उसको लेकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है- सचिव बैद गुर तीनि जौं  प्रिय बोलहिं भय आस राज धर्म तन तीनि कर  होइ बेगिहीं नास॥ मंत्री, वैद्य और गुरु- ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं (ठकुर सुहाती कहने लगते हैं), तो (क्रमशः) राज्य, शरीर और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ चाटुकारों, डरपोक और स्वार्थी लोगों से घिरा रावण अपनी बुद्धिमत्ता, वीरता और ऐश्वर्य के होते हुए भी नाश को प्राप्त होता है, कीर्ति, यश,तेज, ज्ञान सब कुछ नष्ट हो गया क्योंकि अहंकार हो गया उसे अपने पास सब कुछ होने का और इस अहंकार का पोषण  उसके सचिव सलाहकार ही कर रहे थे। वहीं रामजी की सेना में सलाहकार की भूमिका में जामवंत जी थे, उनकी सलाह कैसी होती थी उसे देखने के लिए हमें किष्किन्धा-काण्ड के उस भाग में जाना है जहां वानर दल माता जानकी की खोज करते हु...

नवरात्र विचार 2 लक्ष्य का सन्धान करें

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नवरात्र चल रहे है तो शक्ति की उपासना घर घर हो रही है, बात शक्ति की हो तो बाबा हनुमंत लाल जी का स्मरण तो सबको आता ही है, वे ना केवल शक्ति के बल्कि युक्ति के भी देवता है।  हर बार जीत की दूदूम्भी नहीं बजाई जाती, लक्ष्य पर नजर रखकर काम करने की प्रेरणा देते है हनुमंत लाल जी। शक्ति की उपासना के पर्व में हनुमंत लाल जी की आराधना में सुन्दरकाण्ड के पाठ भी हो ही रहे है तो आइये, जीवन का एक मंत्र वहीं से सीखते है।      बाबा हनुमंत लाल जी ने लंका की अशोक वाटिका में पहुंचकर माता जानकी के दर्शन करने के उपरांत अशोक वाटिका का विध्वंस किया साथ ही निशाचरों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा, रावण के पुत्र अक्षय कुमार का भी वध किया फिर ब्रह्मास्त्र का मान रखने के लिए मेघनाथ के हाथों बंध कर लंका के राज दरबार में रावण के सम्मुख पहुंचे और फिर लंका जलाकर भगवान राम के पास वापस आए यह हम सब जानते हैं।    पर जाते समय माता सीता का पता लगाने से पहले वे सूक्ष्म रूप धारण करते है, वे जब बाद में सब कुछ तोड़ते, जलाते है तो पहले छुपे क्यों? क्या उन्हें किसी बात का डर था?    नहीं, उनके लिए महत्व...

नवरात्र विचार 1

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 जब सब उसके हाथ है तो मैं क्यों करूँ?  ऐसे ही कई सवाल आपके सामने कई लोगों ने रखें होंगे,  वे अपने इस सवाल के साथ श्रीराम चरित मानस की यह चौपाई सामने रख कर सवाल दागते है। होइहि सोइ जो राम रचि राखा।  को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ क्या इसमें कर्म की मनाही की गई है?  क्या इसमें व्यक्ति को कर्महीन होने को कहा गया है? क्या इसमें सब कुछ ईश्वर ही करेंगे ऐसा कहा गया है? ऐसा नहीं है, तो क्या है इस चौपाई में?  आइये, इसे एक उदाहरण से समझते है। एक किसान खेत में फसल लगाता है तो उसे फसल लगाने से पहले खेत को तैयार करना है, अच्छे बीज लेने है उन्हें अच्छी तरह लगाना भी है। पर इसके आगे बारिश होने या सूखा पड़ने , हवा चलने या हवाएं बंद हो जाने, धूप तेज या जरुरत के अनुसार आने, ओले पड़ने अथवा नहीं गिरने  जैसे काम उसके हाथ नहीं है वह तय नहीं कर सकता, यह सब कुछ विधि के हाथ है, विधाता या नियंता की मर्ज़ी पर है। इसलिए ही इस चौपाई में कहा गया है जो व्यक्ति के प्रयासों से परे है वह ईश्वर के हाथ है, इस पर बहस नहीं हो सकती ना ही व्यक्ति दोषी होता है। इसलिए तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता जी में ...

नन्द के आनंद भयो...

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प्रतीक्षा कीजिये, वो आएंगे ही.... मध्य भारत का गौरवशाली साम्राज्य हस्तिनापुर, एक समय का वैभव और शक्ति का प्रतीक, अब धीरे-धीरे षड्यंत्रों की भंवर में फंसता जा रहा था। सिंहासन पर विराजमान राजा अपनी बुद्धि को दूर गांधार की कुटिल चालों के हवाले कर अपने आपको निश्चिंत मान चुका था।  तो युग का वह महानतम योद्धा, जिसका नाम ही शत्रुओं के दिलों में खौफ पैदा करता था, अब असहाय-सा बंधन में जकड़ा हुआ था। उसके लिए स्वयं का स्व बड़ा था यही उसके लिए धर्म था और यही राष्ट्र धर्म। एक अनैतिक प्रेम से जन्मा तूफान हस्तिनापुर को अधर्म के पंजों में जकड़ने को तैयार खड़ा था। उधर, मथुरा में सत्तान्ध कंस अधर्म का परचम लहरा रहा था। उसने अपने पिता, बहन, बहनोई और पूरे कुटुंब को कैद की बेड़ियों में जकड़ लिया था । उसके जैसे ही शैतानी मानसिकता वाले ताकतें उसका साथ दे रही थीं, और धर्म को मानने वाले लोग लाचार थे, विवश थे और थे मौन । पूर्व में मगध की धरती पर जरासंध का राज था—एक ऐसा शासक, जिसका खुद का अस्तित्व भी दो गर्भों से जन्मे टुकड़ों को राक्षसी मंत्रों से जोड़कर बना था। उसकी ताकत, उसका बल, उसका रौब—कोई उसके आसपास भ...

भारत विभाजन विभीषिका की स्मृति

 एक ओर आज़ादी का जश्न मनाने की आतुरता दूसरी और कुर्सी की तरफ बढ़ते नेताओं की पदलिप्सा के बीच अपने ही देश में विभाजन की विभीषिका झेल रहे करोड़ों लोगों का रुदन किसी को सुनाई ही नहीं दिया। सिसकियां दबी रह गई, रुदन पर नेताओं का जश्न भारी हो गया। लाखों महिलाएं बलात्कार की शिकार हो गई क्योंकि मजहबी गुंडों के लिए काफिर की औरत से व्यभिचार सकून देता है।  बाप के सामने बेटी, बेटे के सामने माँ, पति के सामने पत्नी सब लाचार बेबस, बस ठगे से रह गए उन्होंने भरोसा किया था महात्मा गांधी की उस बात पर कि भारत का विभाजन होता तो मेरी लाश पर से। रातों रात लाखों करोड़ों की दौलत घर व्यापार सब छोड़कर भागना पड़ रहा था और इधर भारत में सेक्युलर हो जाने की घूँटी पिलाकर अहिंसा परमो धर्म का शहद चटाया जा रहा था और जो शख्स अहिंसा की गोली बनाकर मजलूम हिन्दुओं को खिला रहा था वो खुद कोलकाता में गोपाल पांडा से संरक्षण मांग रहा था, हथियार सहित और हथियार भी बिना लाइसेंस के अपने पास रखकर बस उसकी जान बचा ले इस आग्रह के साथ।   अंग्रेजी हुकूमत ने हिंदुस्तान का विभाजन किया उसे हिंदुस्तान का इसके मूल निवासी अपने आप को हिंदू...

ऑपरेशन सिंदूर जारी है...

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ना मोदी रुका, ना भारत झुका भारत-पाकिस्तान के वर्तमान हालात पहलगाम में पाकिस्तान पोषित मजहबी आतंकियों के द्वारा बेगुनाह भारतीयों की हत्या के बाद बनें। इस कायरतापूर्ण कार्यवाही के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब की अपनी यात्रा को बीच में छोड़कर आए और कहा गुनहगारों को ऐसी सजा मिलेगी जो उन्होंने सपने में भी नहीं सोची होगी।  इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सेना को स्थान,समय और लक्ष्य तय करने के लिए  स्वतंत्र कर दिया यानि खुली छूट दे दी,विपक्ष ने सर्वदलीय बैठक में कहा सरकार जो भी कदम उठाएगी हम उसके साथ।  एक तरफ विपक्ष के नेता कह रहे थे कि हम सरकार के साथ हैं, सरकार जो भी कदम उठाएगी उस पर हमारी सहमति है वहीं दूसरी ओर उसके नेता बार-बार सरकार से सवाल पूछ रहे थे कार्यवाही कब करोगे? 2014 से पहले क्या देश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों ने कोई बम धमाका नहीं किया ? कोई हमला नहीं किया ? क्या बेगुनाहों की जान नहीं ली ? अगर ऐसा हुआ था तो उस समय की सरकारों ने क्या किया था ? 26/11 की आतंकी घटना में पाकिस्तान के नागरिक के जिंदा पकड़े जाने के बावजूद तत्कालीन कांग्रेस सरकार पाकिस्तान को...

चंद्र शेखर जी - बहुआयामी व्यक्तित्व

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 साधारण सी पारिवारिक पृष्ठभूमि पर विचार की प्रखरता के धनी जब राजनीति की रपटीली राहों पर चलते हैं तो अपनी विशिष्ट छाप छोड़ते ही  हैं।  राजनीतिक क्षेत्र के प्रलोभन से जब उनका नाता नहीं होता और वैचारिक प्रतिबद्धता उनके लिए सब कुछ हो जाती है तो वे बन जाते हैं अजातशत्रु या फिर अपने कार्यकर्ताओं के अभिभावक।  इसी प्रकार का वैशिष्ट्य रखने वाले राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री एवं वर्तमान में तेलंगाना में संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी से संभाल रहे श्री चंद्रशेखर जी रखते है। जिनका आज जन्मदिन है। 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बतौर सांसद उम्मीदवार काशी पहुंचे तो क्षेत्रीय संगठन मंत्री के रूप में उन्हें चंद्रशेखर जी मिले, 2017 के उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक चुनाव परिणाम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा उलट फेर हुआ और भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की तो उस समय चंद्रशेखर जी वहां संगठन मंत्री थे। राजस्थान में 2018 के चुनाव की दुंदुभी बज चुकी थी, चौसर बिछ चुकी थी, सत्ता और संगठन में बैठे शीर्ष के लोगों को बिना संगठन मंत्री काम करने की आदत पड़ चुकी थ...

हनुमान चालीसा में छुपे है मैनेजमेंट के गुण

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हनुमान जी को उनकी शक्ति, भक्ति, और नेतृत्व के लिए जाना जाता है। हनुमान चालीसा में छिपे प्रबंधन के सूत्र हमें व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता पाने में मदद कर सकते हैं।  श्रीगुरु चरन सरोज रज,  निज मनु मुकुरु सुधारि। गुरु का सम्मान करें - बड़ों और मेंटर्स का मार्गदर्शन प्रगति के लिए आवश्यक है। कंचन बरन बिराज सुबेसा,  कानन कुंडल कुंचित केसा। व्यवस्थित और अच्छा व्यवहार - पहला इंप्रेशन मायने रखता है; कपड़े और व्यवहार करियर को प्रभावित करते हैं । बिद्यावान गुनी अति चातुर,  राम काज करिबे को आतुर। डिग्री से परे,कौशल विकसित करें - गुण और बुद्धि सफलता के लिए जरूरी हैं, केवल डिग्रियाँ पर्याप्त नहीं । प्रभू चरित सुनिबे को रसिया,  राम लखन सीता मन बसिया । अच्छा श्रोता बनें - नेतृत्व के लिए सुनना जरूरी है; समझने को प्राथमिकता दें।  सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा,  बिकट रुप धरि लंक जरावा। परिस्थिति के अनुसार व्यवहार - स्थिति के अनुसार रूप और व्यवहार बदलें, जैसे छोटा या बड़ा रूप धारण करना। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना,  लंकेस्वर भए सब जग जाना। अच्छा सलाहकार बनें...

अब भारत नहीं बनेगा घुसपैठियों की धर्मशाला

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भारत में वर्षों से विदेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाने की मांग की जाती रही है, बढ़ती घुसपैठ के कारण कईं प्रदेशों में जनसंख्या असंतुलन स्पष्ट दिखने लगा, अवैध घुसपैठियों ने अपने वोट बैंक के कारण अब विधायिका में भी अपनी दखल बढ़ानी शुरू कर दी है,यही कारण है कि अवैध घुसपैठ के खिलाफ प्रभावी कानून बनाने के लिए जनता का दबाव भी बनने लगा था। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में बीते बजट सत्र में इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल 2025 रखा और कांग्रेस,तृणमूल कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद इसे बहुमत से पारित करवाकर राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेज दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 4 अप्रैल को इसे कानून बनाने की स्वीकृति दे दी, यह कानून आजादी से पहले बने तीन और एक पुराने कानून को समाप्त कर नए कानून के रूप में आया है। आजादी से पहले  के फॉरेनर्स एक्ट 1946,  पासपोर्ट एक्ट 1920,  रजिस्ट्रेशन ऑफ फॉरेनर्स एक्ट 1939,  और इमिग्रेशन (करियर लाइबिलिटी) एक्ट 2000 के स्थान पर इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट 2025 के रूप मे...

नव निधि और हनुमान जी

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 माँ सीता के शोक का निवारण करने वाले बाबा हनुमंत लाल जी को माता जानकी ने अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता होने का आशीर्वाद दे दिया, हमने कल अष्ट सिद्धियां की चर्चा की आज हम बात करेंगे नव निधि की।  महापद्म निधि - जब संपत्ति का अर्जन सात्विक तरीके से किया जाए अपनी क्षमता में बढ़ोतरी समाज के हित में की जाए वह क्षमता और सामर्थ्य महापद्म निधि के रूप में संचित माना जाता है। ऐसा व्यक्ति अपनी संपदा और शक्ति का उपयोग समाज के लिए भी करता है। पद्म निधि - बुद्धि और ज्ञान के संयुक्त रूप से अर्जित सामर्थ्य इस निधि के अंतर्गत आता है।  ऐसे व्यक्ति में सत्व और रजो गुण दोनों होते है। मुकुंद निधि - ऐसी निधि ईश्वरीय अनुकंपा से ही प्राप्त होती है, यह निधि सकारात्मक सोच और करुणा के भाव से अर्जित होती है। ऐसे व्यक्ति भावनात्मक रूप से लोगों से जुड़ते है। नंद निधि - विचारों की सकारात्मकता इतनी की घोर नकारात्मकता के माहौल में भी सहज  और प्रसन्नचित व्यक्ति रहता है। मकर निधि - नवाचार,नव विचारों के प्रस्फुटन और रचनात्मकता को बढ़ाने वाली यह निधि व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण करती है। कच्...

क्या हनुमान जी ने किया था कभी अष्ट सिद्धियों का प्रयोग ?

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कल हमने चर्चा की थी, कि माता जानकी ने हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नव निधि का दाता होने का आशीर्वाद दिया। हनुमान जी को अष्ट सिद्धियां प्राप्त हैं  लेकिन क्या इनका उपयोग उन्होंने कभी किया था? कौन सी हैं अष्ट सिद्धियां? ये तो हम सभी जानते हैं कि हनुमान जी को अष्ट सिद्धियां मिली हुई हैं। ये सिद्धियां ऐसी हैं जिनके उपयोग से कुछ भी किया जा सकता है। पहले जानते हैं कि ये आठ सिद्धियां कौन-कौन सी हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व।  अष्ट सिद्धि के बारे में कल भी हमने पढ़ा और आज फिर एक बार उनका स्मरण किया है, अब हम जानते हैं कि बाबा हनुमंत लाल जी ने इन सिद्धियों का कब-कब प्रयोग किया। अणिमा सिद्धि - इसका मतलब है कि अणु से भी छोटा यानि ये सिद्धि शरीर को अणु से भी छोटा कर देती है।  हनुमान जी को जब  विशाल समुद्र को पार कर लंका जाना था, माता सीता के बारे में पता करने तब समुद्र के बीच में उन्हें एक विशाल राक्षसी सुरसा ने रोक लिया था। इस वक्त हनुमान जी ने खुद को छोटा कर सुरसा के मुंह प्रवेश किया और वापस निकल आए।  जस-जस सुरसा बदनु बढ़ावा।  ...

माता जानकी का हनुमान जी को आशीर्वाद

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क्या है माता जानकी के आशीर्वाद का अर्थ? शक्ति उपासना का पर्व हो और बात हनुमान जी की नहीं हो तो फिर शक्ति की उपासना का पर्व अधूरा सा लगता है, क्योंकि बाबा हनुमंत लालजी  और शक्ति एक दूसरे के पूरक से लगते हैं । जब हम श्री हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, उसमें आता है -  अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता  अस वर दीन जानकी माता  अर्थात माता जानकी ने बाबा हनुमंत लाल जी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता बना दिया।  इसका यह मतलब भी  स्पष्ट है कि बाबा हनुमंत लाल जी अष्ट सिद्धि और नौ निधि देने के लिए अधिकृत हैं,उससे पहले उनके पास यह सिद्धियां और निधियां थी पर दे नहीं सकते थे पर जब माता जानकी ने उनका आशीर्वाद दे दिया, यह वरदान दे दिया तो फिर इसे देने के अधिकारी हो गए । क्या हमने कभी विचार किया है कि यह अष्ट सिद्धियां क्या है ? और नौ निधियाँ क्या है? आईए,जानते हैं अष्ट सिद्धि और नौ निधि के बारे में। अष्ट सिद्धि -  1.अणिमा, 2.महिमा, 3.गरिमा, 4.लघिमा, 5.प्राप्ति, 6.प्राकाम्, 7.ईशित्व, 8.वशित्व। नौ निधि   1.पद्म निधि, 2.महापद्म निधि, 3.नील निधि, 4.मुकुंद निधि, 5.नंद निधि...

भारत को इंडिया कहने की विवशता क्यों ?

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हाल ही के दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय  हौसबोले ने कहा कि "भारत का अंग्रेजी नाम इंडिया नहीं बल्कि 'भारत' कहा जाना चाहिए। यह कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया' है, 'रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया' है... ऐसा क्यों है? ऐसा सवाल उठना चाहिए। इसे सुधारा जाना चाहिए। अगर देश का नाम भारत है, तो इसे इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। हौसबोले ने कहा कि भारत एक भौगोलिक इकाई या संवैधानिक ढांचे से कहीं अधिक है; यह एक गहन दर्शन और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है"। उनका कथन और सुझाव समाज और राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष मार्गदर्शन की तरह है। आखिर हम अंग्रेजों के दिए नाम को ढोने के लिए विवश क्यों हैं? हमारे ऋषि-पूर्वजों ने इस राष्ट्र को एक सांस्कृतिक नाम 'भारत' दिया था, हमारा कर्तव्य है कि हम इसी नाम के साथ स्वयं को जोड़ें। यह कितना बेतुका है कि हम अपने देश का नाम हिन्दी में 'भारत' लिखते हैं और अंग्रेजी में 'इंडिया'। क्या किसी और देश के नाम के साथ हमने ऐसा देखा है? उत्तर है- नहीं। क्योंकि किसी भी भाषा में नाम का अनुवाद नहीं किया जाता है। नाम मौल...